नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने ‘राष्ट्रपति संदर्भ’ पर 10 दिन तक दलीलें सुनने के बाद गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में शीर्ष न्यायालय से जानना चाहा था कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग करने के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समय-सीमा निर्धारित की जा सकती है। अंतिम सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई ने यह टिप्पणी भी की कि यदि लोकतंत्र का एक पक्ष अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल रहता है, तो न्यायालय, जो संविधान का संरक्षक है, शक्तिहीन होकर चुपचाप हाथ पर हाथ धरे निष्क्रिय होकर नहीं बैठा रह सकता है।
संविधान पीठ ने 19 अगस्त को की थी सुनवाई शुरू
शीर्ष न्यायालय ने ‘राष्ट्रपति संदर्भ’ पर सुनवाई के लि 5 सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया था। न्यायमूर्ति बी आर गवई की अध्यक्षता वाले इस पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रमनाथ, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर शामिल थे। इस पीठ ने 19 अगस्त को इस संदर्भ पर सुनवाई शुरू की थी, जो गुरुवार तक चली। देश के सर्वोच्च विधि अधिकारी, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी की दलीलें पूरी होने के बाद पीठ ने मामले को फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया।
दो महीने के अंदर आ सकता है फैसला
माना जा रहा है कि अब इस पर दो महीने के अंदर फैसला आ सकता है क्योंकि 23 नवंबर को सीजेआई न्यायमूर्ति बीआर गवई रिटायर हो रहे हैं। पीठ ने सुनवाई पूरी करते हुए पूछा कि क्या राज्यपालों द्वारा अपने कर्तव्य में विफल रहने पर न्यायालय को चुपचाप निष्क्रिय होकर बैठे रहना चाहिए? तो क्या न्यायालय चुपचाप रहेगा? बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार अंतिम सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गवई ने टिप्पणी की कि मैं सार्वजनिक रूप से कहता रहा हूं कि मैं शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत में दृढ़ विश्वास रखता हूं और यद्यपि न्यायिक सक्रियता होनी चाहिए लेकिन इसे ‘न्यायिक दुस्साहस’ में नहीं बदला जाना चाहिए लेकिन साथ ही यदि लोकतंत्र का एक पक्ष अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो क्या न्यायालय, जो संविधान का संरक्षक है, शक्तिहीन होकर चुपचाप हाथ पर हाथ धरे निष्क्रिय होकर बैठा रहेगा?
कार्यपालिका और विधायिका भी संविधान की संरक्षक
इसके जवाब में केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कार्यपालिका और विधायिका भी संविधान की संरक्षक हैं। एक समन्वयकारी सांविधानिक पदाधिकारी (इस मामले में राज्यपाल) के विधायी विवेकाधीन कार्य के संबंध में परमादेश जारी करना शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। मेहता ने संदर्भ का विरोध करने वाले विपक्ष शासित तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और हिमाचल प्रदेश की दलीलों का भी विरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हो गया था विवाद
राष्ट्रपति का यह संदर्भ तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विधेयकों से निपटने में राज्यपाल की शक्तियों पर शीर्ष न्यायालय के आठ अप्रैल के फैसले के बाद आया था, जिसमें कहा था कि राज्यपालों को उचित समय सीमा के भीतर कार्य करना चाहिए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकने के लिए सांविधानिक चुप्पी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इस फैसले पर विवाद हो गया था। इसके बाद पांच पृष्ठों के संदर्भ में राष्ट्रपति मुर्मू ने उच्चतम न्यायालय से 14 प्रश्न पूछे और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों से निपटने में अनुच्छेद 200 तथा 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों पर उसकी राय जाननी चाही थीं। एजेंसियां