नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को रोजगार में दिव्यांगों के प्रति भेदभाव का उल्लेख करते हुए केंद्र से सवाल किया कि अनारक्षित श्रेणी के लिए निर्धारित ‘कट-ऑफ’ से अधिक अंक प्राप्त करने वाले मेधावी उम्मीदवारों को ‘आगे बढ़ाने’’ के लिए क्या उपाय किये गये हैं। न्यायालय ने केंद्र से निर्देश दिया कि वह 14 अक्टूबर तक अपना जवाब दाखिल करे।
‘आरक्षण’’ की सकारात्मक व्याख्या जरूरी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता के पीठ ने दिव्यांगों के समक्ष पेश आने वाली प्रणालीगत बाधाओं को दूर करने और वैधानिक सुरक्षा उपायों के प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप के अनुरोध वाली याचिकाओं पर यह टिप्पणी की। पीठ ने दिव्यांग अधिकार अधिनियम (आरपीडब्ल्यूडी), 2016 के तहत आरक्षण के पहलू पर विचार किया और कहा कि अधिनियम की धारा 34 के तहत ‘आरक्षण’’ की सकारात्मक व्याख्या करना अनिवार्य है। अधिनियम की धारा 34 दिव्यांगों के लिए रोजगार में आरक्षण से संबंधित है। पीठ ने दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आरक्षण के एक महत्वपूर्ण पहलू का उल्लेख किया और कहा कि सामाजिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप भेदभाव का सामना करने वाले लोगों के मुकाबले दिव्यांगों को कहीं अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
अगली सुनवाई 13 मार्च को
पीठ ने अपने 65 पृष्ठ के फैसले में कहा कि दिव्यांग संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत सामाजिक आरक्षण के हकदार हैं, जो आरक्षित श्रेणी के व्यक्ति द्वारा मूल्यांकन प्रक्रिया में अच्छा प्रदर्शन करने और अनारक्षित श्रेणी के कट-ऑफ से ऊपर मेधा में आने पर उन्हें ऊपर बढ़ाने का प्रावधान करता है। पीठ ने कहा कि ऐसा मेधावी उम्मीदवार स्वतः ही अनारक्षित श्रेणी में चला जायेगा, जिससे आरक्षित सीट खाली रह जायेगी और यह मूल्यांकन प्रक्रिया में कम अंक पाने वाले आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को मिल जायेगी। पीठ ने कहा कि हालांकि हमें सूचित किया गया है और यह गंभीर चिंता का विषय है कि दिव्यांग अधिकार अधिनियम के तहत संरक्षित दिव्यांगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता है, जो योग्यता में उच्च स्थान पर होने के बावजूद, इस तरह से ऊपर बढ़ने से वंचित रह जाते हैं। पीठ ने केंद्र से 14 अक्टूबर तक अपने प्रश्न का उत्तर देने को कहा और सुनवाई आगामी 13 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी।