स्कूल में हिजाब मामले में FIR रद्द करने से इनकार

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला
सांकेतिक तस्वीर
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छात्राओं पर कथित दबाव और धमकी के आरोप

जबलपुर/दमोह : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दमोह के गंगा जमुना उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में छात्राओं को कथित तौर पर हिजाब पहनने और विशेष मजहबी प्रथाओं का पालन करने के लिए मजबूर किए जाने के मामले में चार पूर्व पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने कहा कि छात्राओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध कथित तौर पर धमकी और दबाव डालने के विशअदालत ने स्कूल के पूर्व पदाधिकारी शैलेंद्र कुमार जैन, अब्दुल वसीम बारी, शिक्षक अनस अथर और कार्यालय सहायक रुस्तम अली की ओर से दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में आरोपियों नेिष्ट आरोपों को प्रथम दृष्टया निराधार नहीं कहा जा सकता।

चार आरोपियों की याचिकाएं खारिज

अदालत ने स्कूल के पूर्व पदाधिकारी शैलेंद्र कुमार जैन, अब्दुल वसीम बारी, शिक्षक अनस अथर और कार्यालय सहायक रुस्तम अली की ओर से दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में आरोपियों ने उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी।

हिजाब, नमाज और उर्दू को लेकर आरोप

मामले में आरोप लगाया गया है कि स्कूल में छात्राओं के लिए हिजाब पहनना, नमाज पढ़ना और उर्दू भाषा का अध्ययन करना अनिवार्य किया गया था। साथ ही, हिंदू छात्राओं को तिलक और कलावा पहनने से रोकने के भी आरोप लगाए गए। छात्राओं की शिकायतों के बाद मामले ने तूल पकड़ा था।

पोस्टर सामने आने के बाद शुरू हुई जांच

मई 2023 में स्कूल की कुछ हिंदू छात्राओं के हिजाब पहने हुए एक पोस्टर के सामने आने के बाद राज्य सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए थे। इसके बाद छात्राओं की शिकायतों के आधार पर तत्कालीन जिलाधिकारी ने जांच समिति गठित की। समिति ने स्कूल से जुड़े आरोपों की जांच कर अपनी रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी थी।

कई धाराओं में दर्ज हुआ था मामला

जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए, 120-बी और 506 के अलावा किशोर न्याय अधिनियम तथा मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोपों में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, आपराधिक षड्यंत्र और धमकी से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।

आरोपों की सत्यता साक्ष्यों से तय होगी

हाई कोर्ट ने कहा कि FIR में छात्राओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध हिजाब पहनने और मजहबी प्रथाओं का पालन करने के लिए धमकी तथा दबाव डालने के स्पष्ट आरोप लगाए गए हैं। इसलिए इन आरोपों को इस स्तर पर निराधार नहीं माना जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपों में कितनी सच्चाई है, इसका निर्धारण मुकदमे के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

पुलिस पहले ही दाखिल कर चुकी है आरोपपत्र

अदालत के समक्ष यह भी सामने आया कि पुलिस इस मामले में जांच पूरी कर आरोपपत्र पहले ही दाखिल कर चुकी है। ऐसे में अदालत ने आरोपों की विस्तृत सत्यता पर इस चरण में फैसला देने के बजाय कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ने देने का निर्णय लिया। कोर्ट के फैसले के बाद चारों आरोपियों के खिलाफ दर्ज मामला जारी रहेगा।


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