

ब्रह्मांड को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने अब तक रोशनी, रेडियो तरंगों और अन्य संकेतों का सहारा लिया है। लेकिन कुछ ऐसे कण भी हैं जो लगभग बिना किसी रुकावट के अंतरिक्ष से पृथ्वी तक पहुंचते हैं। इन्हीं बेहद रहस्यमय कणों को समझने की दिशा में अहम काम करने वाले बेल्जियम में जन्मे अमेरिकी वैज्ञानिक फ्रांसिस हेल्जेन को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। उन्हें यह सम्मान आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में निर्णायक योगदान और खगोलीय स्रोतों से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज के लिए मिला है।
खास बात यह है कि 1992 के बाद पहली बार भौतिकी का नोबेल पुरस्कार केवल एक वैज्ञानिक को दिया गया है। हेल्जेन को 12 करोड़ स्वीडिश क्रोनर की पुरस्कार राशि भी मिलेगी।
फ्रांसिस हेल्जेन का जन्म 1944 में बेल्जियम के टिएनेन में हुआ था। उन्होंने बेल्जियम में भौतिकी की पढ़ाई की और बाद में कण भौतिकी के क्षेत्र में काम किया। यूरोप की प्रसिद्ध कण भौतिकी प्रयोगशाला सीईआरएन से जुड़े रहने के बाद वह 1971 में अमेरिका चले गए। वह लंबे समय से यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में भौतिकी के प्रोफेसर हैं।
हेल्जेन की पहचान खास तौर पर न्यूट्रिनो भौतिकी और अंतरिक्ष से आने वाले उच्च-ऊर्जा कणों के अध्ययन से बनी। उनका सबसे महत्वाकांक्षी विचार था कि पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद साफ और विशाल बर्फ की परत को ही एक बेहद बड़े कण डिटेक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही विचार आगे चलकर आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में बदला।
न्यूट्रिनो बेहद छोटे, लगभग भारहीन और विद्युत आवेश रहित कण हैं। इन्हें कई बार ‘भूत कण’ भी कहा जाता है, क्योंकि ये पदार्थ के साथ बेहद कम प्रतिक्रिया करते हैं। हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो हमारे शरीर से होकर गुजर सकते हैं, लेकिन हमें उनका पता तक नहीं चलता।
इन कणों की खासियत यह है कि वे अंतरिक्ष में लंबी दूरी तय करते हुए लगभग सीधी दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इस वजह से वैज्ञानिक इनके जरिए यह पता लगाने की कोशिश कर सकते हैं कि ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली स्रोतों में क्या हो रहा है।
आइसक्यूब को दक्षिणी ध्रुव की बर्फ के भीतर करीब एक घन किलोमीटर क्षेत्र में बनाया गया है। इसके लिए बर्फ के अंदर हजारों प्रकाश सेंसर लगाए गए हैं। जब कोई उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो बर्फ में मौजूद किसी कण से टकराता है, तो बेहद कमजोर रोशनी पैदा हो सकती है। सेंसर इसी रोशनी को पकड़ते हैं।
यह सुनने में आसान लग सकता है, लेकिन इसके पीछे बेहद जटिल तकनीक और वर्षों का काम है। आइसक्यूब में करीब 5,160 सेंसर लगाए गए हैं और इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना से लगभग 450 वैज्ञानिक जुड़े हैं। हेल्जेन ने 1990 के दशक में इस तरह की विशाल न्यूट्रिनो वेधशाला की कल्पना को आगे बढ़ाया। 2011 के आसपास आइसक्यूब पूरी तरह काम करने लगा और इसके बाद इसने ब्रह्मांड को देखने का एक नया रास्ता खोल दिया।
आइसक्यूब की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक 2013 में सामने आई। वैज्ञानिकों ने पहली बार सौरमंडल के बाहर से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो का स्पष्ट प्रमाण हासिल किया। इससे यह साबित करने में मदद मिली कि न्यूट्रिनो का इस्तेमाल दूर अंतरिक्ष में मौजूद अत्यधिक ऊर्जावान घटनाओं और उनके स्रोतों को समझने के लिए किया जा सकता है।
इसके बाद आइसक्यूब ने ऐसे न्यूट्रिनो का पता लगाया, जिनका संबंध दूर की आकाशगंगाओं और बेहद शक्तिशाली ब्रह्मांडीय घटनाओं से जोड़ा जा सका। 2017 में एक उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो को एक दूरस्थ आकाशगंगा में मौजूद अत्यधिक सक्रिय ब्लैक होल की दिशा से जोड़ने में भी सफलता मिली।
2023 में आइसक्यूब ने हमारी अपनी आकाशगंगा यानी मिल्की वे से आने वाले न्यूट्रिनो के प्रमाण भी सामने रखे। इससे वैज्ञानिकों को हमारी आकाशगंगा में मौजूद अत्यधिक ऊर्जावान घटनाओं को समझने का नया जरिया मिला।
हेल्जेन के काम की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ एक नए कण की खोज नहीं, बल्कि ब्रह्मांड को देखने का नया तरीका विकसित करना है। पारंपरिक खगोल विज्ञान में वैज्ञानिक मुख्य रूप से प्रकाश के अलग-अलग रूपों का अध्ययन करते रहे हैं। न्यूट्रिनो के जरिए अब उन जगहों से भी जानकारी हासिल की जा सकती है, जहां से प्रकाश सीधे बाहर नहीं निकल पाता।
यही वजह है कि न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान को आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान की एक नई दिशा माना जा रहा है। आइसक्यूब ने यह दिखाया है कि ब्रह्मांड को सिर्फ रोशनी के जरिए नहीं, बल्कि उसके रास्ते में आने वाले इन बेहद मुश्किल से पकड़े जाने वाले कणों के जरिए भी पढ़ा जा सकता है।
आइसक्यूब में हाल ही में बड़ा तकनीकी उन्नयन किया गया है। इसका उद्देश्य कम ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो का भी बेहतर तरीके से पता लगाना और बर्फ के भीतर उनकी दिशा को अधिक सटीकता से समझना है। इसके आगे आइसक्यूब-जन2 नाम की और बड़ी परियोजना की योजना है, जिससे इस तरह की खोजों की क्षमता कई गुना बढ़ सकती है।
फ्रांसिस हेल्जेन के लिए यह पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह दशकों तक चले उस वैज्ञानिक प्रयास की मान्यता भी है, जिसमें दक्षिणी ध्रुव की बर्फ के भीतर एक विशाल प्रयोगशाला बनाकर ब्रह्मांड के उन संदेशों को सुनने की कोशिश की गई, जिन्हें इंसान सीधे देख नहीं सकता।