

फ्रांस के एवियन में आयोजित G7 समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की करीब डेढ़ साल बाद पहली आमने-सामने मुलाकात हुई। कैमरों के सामने दोनों नेताओं ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया, लेकिन इस छोटी मुलाकात में कई ऐसे संकेत दिखे, जिनकी चर्चा अब कूटनीतिक गलियारों में हो रही है।
दोनों नेताओं की मुलाकात को लेकर कहा जा रहा है कि रिश्तों में औपचारिक गर्मजोशी के साथ-साथ कुछ दूरी भी नजर आई।
G7 नेताओं के फोटोशूट के दौरान मोदी और ट्रंप के बीच की बॉडी लैंग्वेज चर्चा का विषय बनी। दोनों नेताओं ने शुरुआत में एक-दूसरे से पहल करने से परहेज किया। जानकारों के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में आई कुछ तल्खी का असर इस दौरान दिखाई दिया।
फोटो सेशन के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने ट्रंप को पीछे छोड़ते हुए प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की और उन्हें गले लगाया। यह दृश्य वहां मौजूद नेताओं और कैमरों का ध्यान खींचने वाला रहा।
फोटोशूट के बाद जब सभी नेता हॉल में पहुंचे तो प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप की ओर बढ़कर हाथ मिलाया। दोनों की सीटें एक-दूसरे के पास थीं और ट्रंप पहले अपनी जगह पर बैठ चुके थे। मोदी ने पीछे से आकर हाथ मिलाया, लेकिन इस बार दोनों नेताओं के बीच पहले जैसी गर्मजोशी वाला गले मिलना नहीं दिखा।
समिट की औपचारिक शुरुआत से पहले मोदी और ट्रंप ने कुछ मिनट बातचीत की। इस बातचीत में क्या मुद्दे उठे, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। वहां मौजूद इंटरप्रेटर के अलावा किसी को भी बातचीत की पूरी जानकारी नहीं थी।
मुलाकात के बाद सामने आया कि प्रधानमंत्री मोदी ने ओमान की खाड़ी में जहाजों पर हुए हमलों और भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने उठाया। भारत पहले भी इस मामले में अपनी आपत्ति दर्ज करा चुका है।
G7 समिट में फ्रांस ने प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति के बराबर वाली सीट दी। यह भी चर्चा का विषय बना क्योंकि भारत G7 का स्थायी सदस्य नहीं है।
यह सीट पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए हुआ करती थी, जब यह समूह G8 के रूप में जाना जाता था। वर्ष 2014 में क्रीमिया विवाद के बाद रूस को समूह से बाहर कर दिया गया था।
अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या भविष्य में भारत को स्थायी सदस्य बनाकर G7 का विस्तार किया जा सकता है।
G7 में अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज की दुनिया में सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति खनिज, तकनीक या बाजार नहीं बल्कि आपसी भरोसा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संदेश वैश्विक व्यापार और कूटनीति में बढ़ते दबाव के बीच अमेरिका की कुछ नीतियों पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।
मोदी और ट्रंप की यह छोटी मुलाकात भले ही कुछ मिनटों की रही, लेकिन इसके कूटनीतिक संकेतों पर अब दुनिया की नजर बनी हुई है।