पार्थ को सीबीआई मामले में हाई कोर्ट से जमानत

पर जेल से रिहाई नहीं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश बना रोड़ा
पार्थ को सीबीआई मामले में हाई कोर्ट से जमानत
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जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : नियुक्ति घोटाले में गिरफ्तार पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को सीबीआई मामले में हाई कोर्ट से जमानत मिल गई। जस्टिस शुभ्रा घोष ने मामले की सुनवायी के बाद फैसले को आरक्षित कर लिया था। जस्टिस घोष ने शुक्रवार को शर्तों के साथ जमानत पर रिहा किए जाने का आदेश दिया। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के कारण फिलहाल जेल से रिहा नहीं हो पाएंगे। पार्थ को दस लाख रुपए के बांड पर रिहा किया जाएगा। इसके साथ ही इतनी ही रकम की स्योरिटी भी देनी पड़ेगी, जिसमें से 50 फीसदी लोकल होनी चाहिए।

एडवोकेट अपलक बसु ने बताया कि जस्टिस घोष ने शर्तों के साथ जमानत पर रिहा किए जाने का आदेश दिया है। उनकी तरफ से सीनियर एडवोकेट मिलन मुखर्जी ने पैरवी की थी। शर्तों के तहत पार्थ चटर्जी को अपना पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा करना पड़ेगा। ट्रायल कोर्ट की अनुमति के बगैर वे इसके न्यायिक अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं जा पाएंगे। सुनवायी की प्रत्येक तारीख पर उन्हें कोर्ट में हाजिर होना पड़ेगा। तथ्यों और गवाहों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करेंगे। किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे और गवाहों से संपर्क साधने की कोशिश नहीं करेंगे। उन्हें अपना मोबाइल नंबर ट्रायल कोर्ट और जांच एजेंसी को देना पड़ेगा और उनकी अनुमति के बगैर उसे बदल नहीं सकते हैं। अगले आदेश तक पार्थ को सप्ताह में एक दिन आईओ से मिलना पड़ेगा। किसी सार्वजनिक पद पर उनकी नियुक्ति नहीं की जा सकती है। अलबत्ता विधायक की भूमिका निभाते रहेंगे। अगर इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन होता है तो ट्रायल कोर्ट को इस कोर्ट की अनुमति के बगैर ही जमानत खारिज करने का अधिकार होगा। यहां गौरतलब है कि पार्थ चटर्जी को 2022 में 23 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था। इस मामले को छोड़ कर बाकी सभी मामलों में उन्हें जमानत मिल चुकी है। जज ने टिप्पणी की है कि पीटिशनर के खिलाफ आरोप है कि एक साजिश के तहत उसने बगैर इंटरव्यू के प्राइमरी टीचरों की नियुुुक्ति की थी। जस्टिस घोष ने टिप्पणी की है कि प्रथम दृष्टया यह साबित होता है कि पीटिशनर ने मानिक भट्टाचार्या के साथ मिल कर अयोग्य व्यक्तियों को प्राइमरी टीचर के पद पर नियुक्त किया था। कहा है कि सारे तथ्य दस्तावेजों पर आधारित हैं और ये सीबीआई के पास है। पीटिशनर के फरार होने की कोई संभावना नहीं है और उम्र जनित बीमारियों का शिकार हैं। इसलिए जमानत पर रिहा किए जाने का आदेश दिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है पहले चार्जफ्रेम

सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 18 अगस्त को पार्थ चटर्जी की जमानत याचिका पर सुनवायी के दौरान आदेश दिया था कि पार्थ चटर्जी को जमानत पर रिहा करने से पहले चार सप्ताह के अंदर उनके खिलाफ चार्ज फ्रेम करना पड़ेगा। इसके बाद दो माह के अंदर इस मामले के महत्वपूर्ण गवाहों का बयान ट्रायल कोर्ट में दर्ज कराना पड़ेगा। इसके बाद ही ट्रायल कोर्ट उनकी जमानत पर आदेश दे पाएगा। यहां गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि ट्रायल कोर्ट के जज को बांड के बाबत संतुष्ट होना पड़ेगा।

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