नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने सार्वजनिक संस्थानों में वित्तीय तंगी या रिक्तियों की कमी जैसे ‘कारणों’ से लंबे समय से काम कर रहे अस्थायी कर्मचारियों को नियमित नहीं किये जाने और वेतन में समानता से वंचित रखे जाने पर चिंता जताते हुए सरकार से दो टूक कहा है कि वह ‘मार्केट प्लेयर’ नहीं बल्कि सांविधानिक नियोक्ता है और वह आउटसोर्सिंग पर लोगों को नौकरी पर रखकर शोषण नहीं कर सकती।
अस्थायी कर्मचारियों को नियमितीकरण वंचित करना गलत
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता के पीठ ने उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग के दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों द्वारा दायर अपील पर अपने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक संस्थान वित्तीय तंगी या रिक्तियों की कमी जैसे बहाने बनाकर लंबे समय से काम कर रहे अस्थायी कर्मचारियों को नियमितीकरण और वेतन में समानता से वंचित नहीं कर सकते। इन कर्मचारियों का कहना था कि हम सालों से काम कर रहे हैं लेकिन हमें नियमित करने से सरकार ने इनकार कर दिया है। इसके अलावा वेतन भी हमें बहुत कम मिल रहा है जबकि इसी पद के नियमित कर्मचारियों का वेतन कहीं ज्यादा है।
आउटसोर्सिंग ढाल नहीं बन सकती
पीठ ने कहा कि आउटसोर्सिंग ढाल नहीं बन सकती, जिसका इस्तेमाल करते हुए स्थायी कार्यों में लगे कर्मचारियों को उचित वेतन और नौकरी से वंचित रखा जाये। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य (संघ और राज्य सरकारें) कोई निजी कंपनियों की तरह ‘मार्केट प्लेयर’ नहीं हैं। उन्हें फंड की कमी जैसी बात उन लोगों के लिए नहीं करनी चाहिए, जो सरकार के बुनियादी और जरूरी कामों को अंजाम दे रहे हैं। पीठ ने कहा कि यदि कोई काम लगातार चल रहा है तो फिर संस्थान को उसके संबंध में पद भी निकालने चाहिए और लोगों को नियमित भर्ती देनी चाहिए। दरअसल उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग के दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों ने खुद को नियमित किये जाने की अपील कमिशन से की थी। इस अपील को खारिज कर दिया गया और कहा गया कि फंड की कमी है।