

कोलकाता: राज्य में 4 नवंबर से शुरू हुई SIR प्रक्रिया को लेकर लोगों में उत्सुकता और चिंता दोनों ही बढ़ी हुई है। BLO घर-घर जाकर फॉर्म बाँट रहे हैं, लेकिन जब से फॉर्म ऑनलाइन उपलब्ध हुए हैं, तब से हालात एकदम बदल गये हैं।
ऑनलाइन फॉर्म भरना लोगों के लिए राहत होना चाहिए था—खासतौर पर उन लोगों के लिए जो रोज़गार के लिए शहरों से दूर रहते हैं पर वास्तविकता कुछ और ही कहानी कहती है। सुबह की धूप चढ़ते ही शहर के अलग-अलग इलाकों में न जाने कहां से सैकड़ों साइबर कैफे और ऑनलाइन हेल्प डेस्क उभर आये हैं। दीवार पर एक चुप्पा-सा पोस्टर चिपका है—“SIR फॉर्म ऑनलाइन भरा जाता है। मदद उपलब्ध।”
दुकान के सामने लंबी कतार, अंदर भीड़ और हवा में बेचैनी—मंजर कुछ ऐसा है कि लगता है मानो कोई सरकारी परीक्षा चल रही हो। 30 वर्षीय शांता मंडल, जो घरेलू कामकाज के लिए रोज कैनिंग से शहर आती हैं, हाथ में आधार कार्ड दबाए कहती हैं, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं। कौन सा फॉर्म, कैसे भरें—कुछ नहीं समझते। बाबू लोग बोले—150 रुपये दो, फॉर्म भर देंगे। हम क्या करते? मजबूरी है।
दूसरी ओर गरियाहाट, ढाकुरिया, गरिया, बाघाजतिन और कई अन्य स्थानों पर उस काम के लिए जो मूल रूप से पूरी तरह निःशुल्क है, एक-एक फॉर्म भरने के लिए 250 और यहाँ तक कि 300 रुपये तक की मांग की जा रही है। चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने कड़े शब्दों में कहा कि किसी भी वोटर से फॉर्म भरने के नाम पर पैसा लेना गैरकानूनी और पूरी तरह अनैतिक है।
फिर भी भीड़ कम नहीं होती। लोग समय, ज्ञान और संसाधनों की कमी से जूझते हुए इन केंद्रों के भरोसे हैं। ऑनलाइन व्यवस्था का उद्देश्य था—सुविधा, सरलता और पारदर्शिता लेकिन आम नागरिकों के लिए यह नयी सुविधा अब शोषण और मनमानी वसूली का नया अध्याय बन गयी है। डिजिटल इंडिया की राह में यह कहानी एक सवाल छोड़ जाती है—क्या तकनीक सबके लिए है या केवल उन लोगों के लिए जो इसे समझते हैं?