

सन्मार्ग संवाददाता
श्री विजयपुरम : अंडमान एवं निकोबार प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अभियान समिति के अध्यक्ष टीएसजी भास्कर ने भारत के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर द्वीपों के मौजूदा सरकारी कॉलेजों को “नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंस्टीट्यूट ऑफ हायर लर्निंग” के नाम से प्रस्तावित डिम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी में परिवर्तित किए जाने के मुद्दे पर तत्काल हस्तक्षेप की औपचारिक अपील की है। अपने पत्र में उन्होंने कहा कि वर्तमान में द्वीपों के सभी सात सरकारी कॉलेज पांडिचेरी विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं, जो एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, जिसे एनएएसी ए+ मान्यता प्राप्त है और जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत शैक्षणिक प्रतिष्ठा है। इन कॉलेजों को पांडिचेरी विश्वविद्यालय से असंबद्ध कर एक नई डिम्ड यूनिवर्सिटी के अधीन लाने के प्रस्ताव ने छात्रों, अभिभावकों और आम जनता के बीच व्यापक चिंता पैदा कर दी है। उन्होंने आगे कहा कि मौजूदा सरकारी कॉलेजों को एक नव स्थापित डिम्ड यूनिवर्सिटी से जोड़ना छात्रों के व्यापक शैक्षणिक हित में नहीं हो सकता, क्योंकि इससे वर्तमान में एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय के अंतर्गत मिलने वाली डिग्रियों की राष्ट्रीय मान्यता और मूल्य कमजोर पड़ने की आशंका है। साथ ही यह भी आशंका व्यक्त की गई कि इस परिवर्तन से भविष्य में शिक्षा लागत बढ़ सकती है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। भास्कर ने कहा कि पिछले सात दिनों से द्वीपों भर के छात्र अपने-अपने कॉलेजों के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि प्रस्तावित डिम्ड यूनिवर्सिटी से संबद्धता के आदेश को स्थगित रखा जाए तथा पांडिचेरी विश्वविद्यालय से वर्तमान संबद्धता जारी रहे।
उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित मानकों और नियमों के अनुपालन को लेकर भी चिंता जताई और आरोप लगाया कि प्रशासन द्वारा पूर्ण अनुपालन का हलफनामा दाखिल किए जाने के बावजूद कुछ आवश्यक शर्तें पूरी नहीं की गई हैं, जिनकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब यह मामला भारत सरकार और माननीय उच्च न्यायालय के विचाराधीन है, तब प्रस्ताव को लागू करने से कानूनी जटिलताएं, छात्र असंतोष और शैक्षणिक वातावरण में दीर्घकालिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है, जिससे परीक्षा कार्यक्रम, परिसर की सामान्य स्थिति और समग्र शैक्षणिक माहौल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। पत्र के अंत में उन्होंने पुनः यह विश्वास व्यक्त किया कि अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना अधिक दूरदर्शी और स्थायी कदम होगा, जो शैक्षणिक उत्कृष्टता, राष्ट्रीय मान्यता और संस्थागत स्थिरता सुनिश्चित करेगा।