

कोलकाता : लगभग 19 वर्षों बाद शुक्रवार को निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर कोलकाता की धरती पर कदम रखा। उनकी वापसी ने 21 नवंबर 2007 के उस भयावह दिन की यादें भी ताजा कर दीं, जब महानगर ने स्वतंत्रता के बाद के सबसे गंभीर कानून-व्यवस्था संकटों में से एक का सामना किया था।
उस दिन ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम (एआईएमएफ) और फुरफुरा शरीफ नुजद्दिदीन फाउंडेशन के आह्वान पर तसलीमा नसरीन के वीजा नवीनीकरण के विरोध में शुरू हुआ प्रदर्शन देखते ही देखते हिंसक हो गया। पार्क सर्कस, रिपन स्ट्रीट, तपसिया, एजेसी बोस रोड और आसपास के इलाकों में चक्का जाम, पथराव, आगजनी तथा पुलिस पर हमले हुए।
पुलिस के कई वाहन क्षतिग्रस्त हो गए, अनेक सुरक्षाकर्मी घायल हुए और हजारों लोग घंटों तक घरों, दफ्तरों तथा सड़कों पर फंसे रहे। दिन का सबसे मार्मिक दृश्य स्कूलों में फंसे हजारों बच्चों और उनकी सुरक्षित वापसी का इंतजार करते अभिभावकों का था। हिंसा के कारण कई स्कूल समय पर बंद नहीं हो सके।
विरोध प्रदर्शनों में सिद्दीकुल्लाह चौधरी और इदरीस अली के नाम प्रमुखता से सामने आए। प्रदर्शनकारियों ने टायर जलाए, तसलीमा नसरीन के पुतले और उनकी पुस्तकों की प्रतियां सार्वजनिक रूप से फूंकी तथा 'गो बैक तसलीमा' के नारे लगाए। दुकानों के शटर गिर गए, यातायात ठप हो गया और पूरे इलाके में भय व तनाव का माहौल फैल गया।
हालात इतने बिगड़ गए कि तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली सरकार को सेना बुलानी पड़ी। पुलिस और सेना ने संयुक्त फ्लैग मार्च किया और कर्फ्यू लागू होने के बाद ही स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो सकी। इस घटना के बाद सुरक्षा कारणों से तसलीमा नसरीन को कोलकाता छोड़ना पड़ा।
उनकी वापसी उस दौर की याद दिलाती है, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द एक साथ कठिन परीक्षा से गुजरे थे।