नेशनल साइंस डे : आईएससीए की बदहाली से फोरम चिंतित

नेशनल साइंस डे : आईएससीए की बदहाली से फोरम चिंतित
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मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : नेशनल साइंस डे के मौके पर फोरम फॉर रिवाइवल ऑफ साइंस, रिवाइवल ऑफ आईएससीए (एफआरएसआरआईएससीए) ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन (आईएससीए) की बदतर स्थिति पर चिंता जताई है। यह सदियों पुरानी संस्था, जो कोलकाता में स्थित है, पिछले 3-4 साल से ठप पड़ी है। एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) और साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट (डीएसटी) के बीच विवाद के कारण सभी एकेडमिक गतिविधियां बंद हैं। फोरम ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। इस मौके पर सम्मेलन में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक और इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष प्रोफेसर शंकर के. पाल उपस्थित थे। उन्होंने कहा, 'सत्ता के दुरुपयोग के कारण विज्ञान कांग्रेस की आज यह दुर्दशा है। जो लोग विज्ञान पर शोध कर रहे हैं, उन्हें और अधिक एकजुट होना होगा।' इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डॉ. कुंतल घोष, 'फोरम फॉर रिवाइवल ऑफ साइंस' के सचिव एम. जी. तिवारी, विश्वभारती विश्वविद्यालय के प्रोफेसर काशीनाथ भट्टाचार्य और 'जॉइंट एक्शन कमेटी ऑफ यूनियंस एंड एसोसिएशंस ऑफ ऑटोनामस रिसर्च इंस्टिट्यूट्स ऑफ वेस्ट बंगाल' के उपाध्यक्ष सुप्रतीक चक्रवर्ती, धीरज शुक्ला सहित कई विशिष्ट लोग उपस्थित थे। आईएससीए की शुरुआत 1914 में कोलकाता के एशियाटिक सोसाइटी में हुई थी। पहली कांग्रेस में 105 वैज्ञानिकों ने बॉटनी से लेकर जियोलॉजी तक 35 पेपर पेश किए। स्वतंत्रता पूर्व के सत्रों में सीवी रमन (1929), एम विश्वेश्वरैया (1923), जेसी बोस (1927), मेघनाद साहा (1934), एसएन बोस (1944), प्रफुल्ल चंद्र राय (1920) जैसे दिग्गज अध्यक्ष रहे। स्वतंत्र भारत में पीसी महालनोबिस (1950), एचजे भाभा (1951), डीएस कोठारी (1963), असीमा चटर्जी (1975) ने भी नेतृत्व किया। ये सत्र विश्व युद्धों के दौरान भी नहीं रुके। फोरम का कहना है कि हाल के वर्षों में ईसी में भ्रष्टाचार, नियमों का उल्लंघन और जनता के पैसे की बर्बादी हुई। सीएजी रिपोर्ट्स में अनियमितताएं बताई गईं। बाय-लॉज पुराने हैं और अदालत ने सरकार के मॉडल बाय-लॉज को रद्द कर दिया।


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