नमामि गंगे से गंगा की सेहत में सुधार, बंगाल में निगरानी और सख्त हुई

औद्योगिक प्रदूषण में 60% कमी, फिर भी कुछ हिस्सों में चुनौती बरकरार
नमामि गंगे से गंगा की सेहत में सुधार, बंगाल में निगरानी और सख्त हुई
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केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा में पहुंचने वाले औद्योगिक प्रदूषण में वर्ष 2017 के बाद करीब 60 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसका असर पश्चिम बंगाल समेत गंगा बेसिन के राज्यों में दिखाई दे रहा है, जहां प्रदूषण नियंत्रण और जल गुणवत्ता निगरानी को और मजबूत किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से निकलने वाला बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) लोड 26 टन प्रतिदिन से घटकर 2024 में 10.75 टन प्रतिदिन रह गया है।

सफलता की मिसाल

अधिकारियों ने बताया कि कानपुर के जाजमऊ टेनरी क्षेत्र में कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी), सीसामऊ नाले के डायवर्जन और जीरो-लिक्विड-डिस्चार्ज मानकों के लागू होने से गंगा में औद्योगिक अपशिष्ट का प्रवाह काफी कम हुआ है। दिसंबर 2023 में शुरू हुए 20 एमएलडी क्षमता वाले सीईटीपी से क्रोमियम और अन्य प्रदूषकों का उपचार किया जा रहा है।

बंगाल समेत पांच राज्यों में कड़ी निगरानी

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में गंगा के मुख्य प्रवाह पर 112 जल गुणवत्ता निगरानी केंद्र संचालित कर रहा है। ऑनलाइन एफ्लुएंट मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए उद्योगों और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की रियल टाइम निगरानी की जा रही है। 275 में से 234 संयंत्र अब लाइव डेटा उपलब्ध करा रहे हैं।

सीवेज अब भी बड़ी चुनौती

अधिकारियों ने माना कि औद्योगिक प्रदूषण घटा है, लेकिन घरेलू सीवेज अब भी गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। नमामि गंगे के तहत अब तक 4,260 एमएलडी सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता विकसित की जा चुकी है। आने वाले वर्षों में सीईटीपी अपग्रेडेशन, उन्नत उपचार तकनीक और उपचारित जल के पुन: उपयोग पर विशेष जोर दिया जाएगा, जिससे पश्चिम बंगाल सहित पूरे गंगा बेसिन में नदी संरक्षण को और मजबूती मिल सके।

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