

निधि, सन्मार्ग संवाददाता
नदिया : पश्चिम बंगाल के नदिया जिले से सरकारी तंत्र की घोर संवेदनशीलता और लापरवाही का एक झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। कृष्णगंज ब्लॉक के शिवनिवास ग्राम पंचायत अंतर्गत पार चंदननगर इलाके में रहने वाले एक बुजुर्ग दंपति पिछले एक साल से खुद को 'जिंदा' साबित करने की जंग लड़ रहे हैं। सरकारी दस्तावेजों में उन्हें 'मृत' घोषित कर दिया गया है, जिसके कारण उनकी बुढ़ापा पेंशन (NSAP) बंद हो गई है।
अंधेरे में बाउल कलाकार का जीवन
94 वर्षीय पांचूगोपाल तरफदार कभी इलाके के मशहूर बाউল कलाकार हुआ करते थे और आजीविका के लिए वैन-रिक्शा चलाते थे। आज उनकी और उनकी पत्नी पार्वती की हालत अत्यंत दयनीय है। कुछ समय पहले अपने इकलौते बेटे को खोने के बाद, यह दंपति पूरी तरह बेसहारा हो गया। टूटी हुई मिट्टी की झोपड़ी में रहने वाले इस परिवार के लिए अब रेशन का चावल और सरकारी भत्ता ही जीवित रहने की एकमात्र उम्मीद थी, लेकिन तकनीकी लापरवाही ने वह भी छीन ली।
भूख और बीमारी से संघर्ष
पांचूगोपाल का आरोप है कि बीजीओ (BDO) कार्यालय के चक्कर काटने पर उन्हें पता चला कि वे सरकारी रिकॉर्ड में मर चुके हैं। पेंशन बंद होने के कारण आज उनके पास दवा खरीदने तक के पैसे नहीं हैं। कई बार उन्हें जंगली पत्तियां या सिर्फ उबले हुए चावल खाकर दिन गुजारना पड़ता है। बुजुर्ग पांचूगोपाल का कहना है कि यह उनकी आवाज दबाने की साजिश है, जबकि उनकी पत्नी पार्वती भारी मन से कहती हैं, "मैं अपने पति को दो वक्त का खाना भी नहीं दे पा रही हूं, यह जीवन कब खत्म होगा?"
सियासी बयानबाजी तेज
इस घटना ने इलाके में राजनीतिक सरगर्मी तेज कर दी है। स्थानीय तृणमूल नेता अशोक कुमार घोष ने स्वीकार किया कि स्थिति चिंताजनक है और वे मदद की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, भाजपा ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रशासन नई योजनाओं के प्रचार में व्यस्त है, लेकिन जमीनी स्तर पर जरूरतमंद दम तोड़ रहे हैं। अब देखना यह है कि सरकारी 'लालफीताशाही' का यह फंदा कब टूटता है और कब इस जीवित दंपति को कागजों में जीवनदान मिलता है।