गैस संकट से मिष्ठान उद्योग पर 'वज्रपात'

मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर करवाया इस संकट से अवगत, 'मिष्टी उद्योग' ने मांगी वैकल्पिक ईंधन की अनुमति
Mishti Udyog seeks permission for alternative fuel
फाइल फोटो
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निधि, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता: पश्चिम एशिया में युद्ध की भयावहता का असर अब बंगाल की विरासत यानी 'मिष्टी' (मिठाई) पर पड़ने लगा है। होरमुज जलडमरूमध्य बंद होने से उपजे एलपीजी संकट ने राज्य के मिष्ठान व्यवसायियों की कमर तोड़ दी है। इस गंभीर संकट को देखते हुए बंगाल के मिठाई और नमकीन निर्माताओं के सबसे बड़े संगठन 'मिष्टी उद्योग' ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो इस बार 'पोयला बैशाख' और 'अक्षय तृतीया' पर बंगाल का पारंपरिक 'हलखाता' उत्सव बिना मिठाई के रह जाएगा।

डेयरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मंडराया खतरा

मिष्टी उद्योग के अध्यक्ष धीमान दास (के.सी. दास) और जिला संयोजक सम्राट दास ने बताया कि यह क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 10 लाख लोगों को रोजगार देता है। गैस की किल्लत का असर सिर्फ हलवाइयों पर नहीं, बल्कि दूध उत्पादकों (ग्वालों) पर भी पड़ेगा। अगर मिठाई की दुकानें बंद हुईं, तो रोजाना लाखों लीटर दूध बर्बाद होगा, जैसा कोविड-19 के शुरुआती दौर में देखा गया था।

अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग के कारीगरों की बढ़ी चिंता

संगठन ने मुख्यमंत्री का ध्यान इस ओर भी खींचा है कि राज्य के मिठाई व्यवसाय में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक (Minorities), ओबीसी (OBC) और पिछड़े वर्ग के लोग शामिल हैं। कमर्शियल गैस की आपूर्ति में 60% की कटौती और कानूनों की जटिलता इन कारीगरों को पुश्तैनी व्यवसाय से दूर कर सकती है। महासचिव नीलांजन घोष के अनुसार, कारीगर डरे हुए हैं कि ईद और बंगाली नववर्ष जैसे बड़े त्यौहारों से पहले उनकी कमाई पूरी तरह बंद हो जाएगी।

मांग: डीजल और बायो-डीजल की मिले अनुमति

फिलहाल डीलरों से केवल 40% गैस मिल पा रही है। 'मिष्टी उद्योग' ने मांग की है कि जब तक एलपीजी संकट बना हुआ है, तब तक मिठाई बनाने के लिए डीजल, बायो-डीजल जैसे वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग की विशेष अनुमति दी जाए। हुगली के दिग्गज व्यवसायी अमिताभ दे (फेलू मोदक) ने कहा कि स्थिति इतनी विकट है कि अब ऑर्डर लेना भी संभव नहीं रह गया है।

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