6 महीने से ज्यादा बिना चुने मंत्री? बिहार मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति को चुनौती, CJI बोले- राज्य बताए, बिना निर्वाचित हुए मंत्री कैसे जारी हैं?
6 महीने से ज्यादा बिना चुने मंत्री? बिहार मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
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नई दिल्ली: क्या कोई मंत्री बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक पद पर बना रह सकता है? क्या छह महीने की संवैधानिक छूट को अलग-अलग कार्यकाल में बांटा जा सकता है? और यदि मंत्री छह महीने पूरे होने से पहले इस्तीफा देकर दोबारा शपथ ले ले, तो क्या छह महीने की अवधि फिर से शुरू हो जाती है? इन अहम संवैधानिक सवालों पर अब सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है।

प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को बिहार सरकार से पूछा कि राज्य यह स्पष्ट करे कि एक मंत्री छह महीने से अधिक समय तक निर्वाचित हुए बिना कैसे पद पर बने हुए हैं। CJI ने कहा, "यह कानून का शुद्ध प्रश्न है। राज्य को बताना होगा कि कोई मंत्री छह महीने से अधिक समय तक बिना निर्वाचित हुए कैसे पद पर बना रह सकता है।"

क्या है मामला?

यह मामला बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश से जुड़ा है। वह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में चार महीने 26 दिन तक मंत्री रहे। 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।

इसके बाद 22 दिनों तक वह मंत्री नहीं रहे। 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनने पर दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री पद की शपथ दिलाई गई, जबकि वह तब भी विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे।

30 मई को दायर याचिका में उनकी नियुक्ति को संविधान के साथ धोखा बताते हुए रद्द करने की मांग की गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि दोनों कार्यकाल जोड़ने पर दीपक प्रकाश छह महीने से अधिक समय तक बिना निर्वाचित हुए मंत्री बने रहे हैं।

संविधान क्या कहता है?

संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंत्री बनाया जाता है और वह राज्य विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे लगातार छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य है। ऐसा नहीं होने पर उसे मंत्री पद छोड़ना होगा।

क्यों अलग है यह मामला?

दीपक प्रकाश का मामला इसलिए अलग माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने छह महीने का कार्यकाल एक बार में पूरा नहीं किया। पहले कार्यकाल में वह चार महीने 26 दिन मंत्री रहे और फिर 22 दिन के अंतराल के बाद दोबारा मंत्री बने। अब सवाल यह है कि क्या दोनों कार्यकाल जोड़कर छह महीने की सीमा मानी जाएगी या दूसरी शपथ के साथ छह महीने की अवधि फिर से शुरू हो जाएगी।

पहले भी मिले हैं ऐसे उदाहरण

भारत में कई मुख्यमंत्री और मंत्री बिना विधायक बने पद पर नियुक्त हुए और बाद में छह महीने के भीतर निर्वाचित हुए।

  • 2019 में उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनने के बाद विधान परिषद के सदस्य बने।

  • 2021 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने छह महीने की समय सीमा पूरी होने से पहले इस्तीफा दे दिया क्योंकि उपचुनाव कराना संभव नहीं था।

  • पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा भी प्रधानमंत्री बनने के बाद राज्यसभा के सदस्य बने थे।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अहम सवाल

अब सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि:

  • क्या छह महीने की संवैधानिक छूट एक ही मंत्री को दोबारा मिल सकती है?

  • क्या इस्तीफा देकर कुछ दिनों बाद फिर मंत्री बनने पर छह महीने की अवधि फिर से शुरू हो जाती है?

  • या फिर कुल कार्यकाल को जोड़कर छह महीने की सीमा लागू होगी?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में बिना निर्वाचित मंत्रियों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल को लेकर महत्वपूर्ण संवैधानिक मिसाल बन सकता है।

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