

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद की ओर से महादेवी वर्मा की जयंती पर “महादेवी वर्मा और स्त्री विमर्श” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए परिषद के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि अमूमन जब भक्तिकाल की बात होती है तो मीरा को हाशिए पर रख कर देखा जाता है और जब छायावाद की बात होती है तो महादेवी वर्मा को हाशिए पर रख कर देखा जाता है। स्त्रियों के दो बड़े आभूषण रहे हैं- मौन और आँसू। विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन की डॉ. श्रुति कुमुद ने कहा कि महादेवी वर्मा अपनी सीमा को अपनी शक्ति बना लेती हैं। आज स्त्री-विमर्श एक गाली की तरह देखा जा रहा है। यह देखना जरूरी है कि भविष्य के गर्भ में स्त्रीवाद का स्वरूप क्या होगा? आज कैंसिल कल्चर को स्त्रियों के ख़िलाफ़ ट्रॉलिंग के टूल्स के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। युवा हस्ताक्षर के रूप में हिंदी विभाग, विद्यासागर विश्वविद्यालय के शोधार्थी सुषमा कुमारी ने कहा कि महादेवी वर्मा ने अपने समय की उन तमाम समाजिक रूढ़ियों, अन्याय और अत्याचारों का विरोध किया जो भारतीय समाज को अपंग बनाने में सहायक था। शोधार्थी रूपेश कुमार यादव ने कहा कि महादेवी वर्मा का रचना-संसार पुरुष वर्चस्व के ख़िलाफ़ एक सशक्त प्रतिरोध है। इस अवसर पर महादेवी वर्मा पर बनी फ़िल्म ‘पंथ रहने दो अपरिचित’ की प्रदर्शनी भी हुई। घनश्याम सुगला,प्रो. हितेन्द्र पटेल, डॉ नंदिता बनर्जी, प्रो.दिलीप शाह, आशीष झुनझुनवाला, विमला पोद्दार, डॉ सुशीला ओझा, ज्योति शोभा, डॉ शिप्रा मिश्रा, ऋतेश पांडेय, हिंदी अधिकारी राजेश साव, अल्पना नायक, राकेश सिंह,मंटू दास, डॉ.श्रद्धांजलि सिंह, डॉ संजय राय,संजय दास, डॉ अनीता राय, जीतेंद्र जीतांशु, डॉ आदित्य सिंह, डॉ रमाशंकर सिंह, सेराज खान बातिश,फरहान अजीज़,एन चंद्र राव, चन्दना मंडल, प्रमोद महतो, सूर्य देव रॉय, शुभोस्वप्ना मुखर्जी, कंचन भगत, शिखा सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि आधी आबादी का आख्यान है महादेवी वर्मा का साहित्य।