

डॉ. गुरू प्रकाश पासवान
25 जून 1975 की आधी रात भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे विवादित घटनाओं में से एक की शुरुआत हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी। सरकार ने इसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बताया, लेकिन विपक्ष और कई इतिहासकारों ने इसे सत्ता बचाने की कोशिश के रूप में देखा।
इस फैसले की पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला था, जिसमें इंदिरा गांधी के 1971 के लोकसभा चुनाव को अमान्य कर दिया गया था और उन पर चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को सही माना गया था। फैसले के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति पर बड़ा संकट खड़ा हो गया था।
25 जून 1975 से मार्च 1977 तक चले आपातकाल के दौरान देश में कई बड़े संवैधानिक बदलाव हुए। मौलिक अधिकारों पर रोक लगा दी गई, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई और बड़ी संख्या में विपक्षी नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
आपातकाल (भारत) के दौरान मीसा (MISA) और अन्य कानूनों के तहत कई लोगों को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया। विपक्षी नेताओं में जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे प्रमुख नाम शामिल थे।
आपातकाल के दौरान अखबारों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ गया। खबरें प्रकाशित होने से पहले सेंसर अधिकारियों की अनुमति जरूरी थी। कई पत्रकारों और संपादकों ने इसका विरोध किया।
इसी दौर में न्यायपालिका की भूमिका भी चर्चा में रही। ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामला में सुप्रीम कोर्ट के बहुमत फैसले ने आपातकाल के दौरान बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के अधिकार को सीमित किया। हालांकि न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना ने इस फैसले से असहमति जताई थी।
आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन अभियान को लेकर सरकार की आलोचना हुई। खासकर जबरन नसबंदी के आरोपों ने बड़े विवाद को जन्म दिया। दिल्ली के तुर्कमान गेट जैसे इलाकों में झुग्गी हटाने की कार्रवाई भी उस समय की सबसे चर्चित घटनाओं में रही।विरोध की आवाजें और 1977 का चुनाव
आपातकाल के खिलाफ देशभर में विरोध हुआ। जयप्रकाश नारायण लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ, समाजवादी नेताओं और कई सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भी विरोध आंदोलन में भूमिका निभाई।
1977 में जब आम चुनाव हुए, तो जनता ने पहली बार केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।
आपातकाल के बाद गठित शाह आयोग ने उस दौर की कई कार्रवाइयों की जांच की।
संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में चेतावनी दी थी कि किसी भी संविधान की सफलता उसे चलाने वाले लोगों पर निर्भर करती है। आपातकाल का दौर इसी बात की याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती केवल कानूनों से नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करने वाली परंपराओं और नागरिक सतर्कता से होती है।
आज भी 25 जून का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाता है, जब देश ने संवैधानिक अधिकारों, स्वतंत्र प्रेस और संस्थाओं की भूमिका को लेकर एक बड़ा सबक सीखा।