

नई दिल्ली : अगर आप अपने घर की छत या बगीचे में सोलर पैनल लगवाने की योजना बना रहे हैं, तो आपके लिए यह खबर महत्वपूर्ण है। 1 जून से देश के सोलर सेक्टर में बड़ा बदलाव लागू हो गया है, जिसके बाद सोलर पैनल लगाने की लागत बढ़ सकती है।
केंद्र सरकार के नए नियम के अनुसार, नेट मीटरिंग और ओपन एक्सेस व्यवस्था के तहत आने वाली सभी सोलर परियोजनाओं में अब केवल भारत में निर्मित सोलर सेल का ही उपयोग किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे देश की सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत होगी और चीन समेत अन्य देशों से आयात पर निर्भरता कम होगी।
हालांकि, इस फैसले का असर उपभोक्ताओं और उद्योग दोनों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोलर पैनल इंस्टॉलेशन की कुल लागत में 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। जिन कंपनियों का कारोबार अब तक आयातित सोलर सेल पर आधारित था, उन्हें भी नई व्यवस्था के अनुरूप बदलाव करने होंगे।
कैसे बनता है सोलर पैनल?
सोलर पैनल के निर्माण की प्रक्रिया पॉलिसिलिकॉन से शुरू होती है। इसे पहले इंगट (Ingot) और फिर वेफर (Wafer) में बदला जाता है। इन्हीं वेफर्स से सोलर सेल तैयार किए जाते हैं। सोलर सेल सूर्य की रोशनी को बिजली में परिवर्तित करते हैं। कई सोलर सेल मिलकर एक सोलर मॉड्यूल या पैनल बनाते हैं, जिसे घरों, दफ्तरों और उद्योगों में स्थापित किया जाता है।
नए नियम के तहत अब सोलर कंपनियों को केवल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त भारतीय निर्माताओं से ही सोलर सेल खरीदने होंगे। यह नियम केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना पर भी लागू होगा।
इसके अलावा, व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्रों में लगाए जाने वाले सोलर सिस्टम पर भी यही नियम प्रभावी रहेगा। सरकार का उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और भारत को सोलर उपकरण निर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती दौर में लागत बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में यह कदम भारतीय सोलर उद्योग को मजबूत करने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में मददगार साबित हो सकता है।