

केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : भारत निर्वाचन आयोग की ओर से जनवरी 2026 में होने वाले अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र एवं चुनाव प्रबंधन सम्मेलन (IICDEM) से पहले नई दिल्ली में मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) का सम्मेलन ऐसे समय आयोजित किया गया है, जब पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची, तार्किक विसंगतियों और FIR को लेकर आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर भारत लोकतंत्र के वैश्विक मॉडल के रूप में खुद को प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर बंगाल में चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर उठ रहे विवाद आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता की कसौटी बनते दिख रहे हैं।
IICDEM से पहले CEO सम्मेलन, अंतरराष्ट्रीय नजरें भारत पर
भारत निर्वाचन आयोग ने नई दिल्ली स्थित IIIDEM में देशभर के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों का सम्मेलन आयोजित किया। यह सम्मेलन 21 से 23 जनवरी 2026 तक होने वाले लोकतंत्र और चुनाव प्रबंधन पर भारत अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (IICDEM) की तैयारी के तहत हुआ।
चुनाव आयुक्तों ने बताई भूमिका, 36 विषयों पर मंथन
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सहित दोनों चुनाव आयुक्तों ने CEOs को IICDEM में उनकी जिम्मेदारियों और 36 थीमैटिक ग्रुप्स की भूमिका से अवगत कराया। ये समूह चुनाव प्रबंधन के हर पहलू पर वैश्विक ज्ञान-साझा मंच तैयार करेंगे।
दुनिया का सबसे बड़ा चुनावी सम्मेलन, 100 अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि
IICDEM 2026 में दुनिया भर के लगभग 100 अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि, चुनाव प्रबंधन संस्थाएं (EMBs), विदेशी मिशन, अंतरराष्ट्रीय संगठन और विशेषज्ञ हिस्सा लेंगे। 40 से अधिक द्विपक्षीय बैठकें और 36 ब्रेकआउट सत्र आयोजित होंगे।
ECINET का लॉन्च, लेकिन बंगाल में सवाल
सम्मेलन में ECINET जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के लॉन्च की भी घोषणा की गई है, लेकिन पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े ‘तार्किक असंगतियों’, सुनवाई प्रक्रिया और FIR को लेकर उठ रहे सवाल आयोग की तैयारियों पर राजनीतिक छाया डाल रहे हैं।
बंगाल में मतदाता विवाद और FIR बना बड़ा मुद्दा
जहां आयोग अंतरराष्ट्रीय मंच पर चुनावी पारदर्शिता का मॉडल पेश करने जा रहा है, वहीं बंगाल में मतदाता सत्यापन, सुनवाई के दायरे के विस्तार और FIR की कार्रवाई को लेकर विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं।
लोकतंत्र की वैश्विक छवि बनाम जमीनी हकीकत
चार IIT, छह IIM, 12 NLUs और IIMC जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की भागीदारी से IICDEM को अकादमिक मजबूती मिल रही है, लेकिन बंगाल की जमीनी चुनावी स्थिति यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या आयोग की घरेलू प्रक्रियाएं उसकी वैश्विक छवि के अनुरूप हैं?