नई दिल्ली : दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला द्वारा अपने पति की प्रेमिका के खिलाफ दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए सोमवार को कहा कि एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर यानी व्यभिचार (एडल्ट्री कानून) अपने-आप में कोई अपराध नहीं है, बल्कि यह एक वजह है जिसे तलाक या वैवाहिक विवाद के मामलों में आधार बनाया जा सकता है। इसके तहत कोई भी महिला या पुरुष अपने वैवाहिक जोड़े के प्रेमी या प्रेमिका पर मुकदमा दायर करने के साथ ही अपनी शादी तोड़ने, आपसी प्रेम को नुकसान पहुंचाने के लिए उससे मुआवजे की मांग भी कर सकता है। इस याचिका में महिला ने पति की प्रेमिका से भावनात्मक नुकसान और साथी की हानि के लिए मुआवजा मांगा है। कोर्ट ने महिला के पति और प्रेमिका को नोटिस जारी किया है, ताकि यह जान सके कि महिला की शादी टूटने की वजह उसके पति की प्रेमिका तो नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया : इस मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने जोसेफ शाइन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया, जिसमें कोर्ट ने व्यभिचार को अपराध से मुक्त कर दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के लिए लाइसेंस घोषित नहीं किया था।
शादी टूटने पर हर्जाना अधिकार : कोर्ट ने बताया कि यद्यपि व्यभिचार अब अपराध नहीं है, फिर भी अगर किसी तीसरे व्यक्ति के कारण शादी टूटती है, तो पत्नी उसे कोर्ट में हर्जाना मांग सकती है। यह मामला सिविल कानून से जुड़ा है, इसलिए इसे फैमिली कोर्ट में नहीं बल्कि सिविल कोर्ट में देखा जाएगा। यह फैसला भारत में ‘एलीनेशन ऑफ अफेक्शन’ सिद्धांत को लागू करने की दिशा में पहला केस बन सकता है। इसके अनुसार विश्वास को जान-बूझकर तोड़ने वाले व्यक्ति को कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
जाने एडल्ट्री कानून है क्या : अगर कोई शादीशुदा महिला या पुरुष किसी अन्य साथी (पुरुष या महिला) से रिलेशन बनाती है तो ऐसी स्थिति में एडल्ट्री कानून के तहत पति या पत्नी उस शख्स के खिलाफ केस कर सकता/सकती थी। यह भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत अपराध था, जिसमें आरोपी को 5 साल की सजा और जुर्माना लगाने का प्रावधान था। ऐसे मामलों में महिला के खिलाफ न तो केस दर्ज होता था और न ही उसे सजा देने का प्रावधान था।2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एडल्ट्री कानून को रद्द कर दिया। तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस कानून को असंवैधानिक बताया था। उन्होंने कहा कि एडल्ट्री को क्राइम नहीं माना जा सकता। जोसेफ शाइनी की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने यह फैसला सुनाया था।