

यूएस-इज़राइल और ईरान के बीच 12वें दिन जारी युद्ध ने न केवल ऊर्जा बाजार को अस्थिर किया है, बल्कि भारत की उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला पर भी गंभीर असर डाला है। ईरानी ड्रोन हमलों और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर अनौपचारिक नाकेबंदी ने मध्य पूर्व और खाड़ी से होने वाले उर्वरक और तेल आयात में अस्थिरता पैदा कर दी है।
भारत की कुल नाइट्रोजन उर्वरक (यूरिया और अमोनिया) की लगभग 63% आपूर्ति और डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) का 32% हिस्सा खाड़ी देशों जैसे UAE, Saudi Arabia, Qatar, और Oman से आता है। वहीं पोटाश का लगभग 42% आपूर्ति सऊदी अरब पर निर्भर है।
हालांकि ईरान से भारत की सीधे खरीदी नगण्य है—2024 में ईरान से केवल $2.59 मिलियन का यूरिया आयात हुआ—लेकिन इन देशों से आने वाले स्टॉक्स स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ से होकर गुजरते हैं। नाकेबंदी या खाड़ी में संघर्ष की स्थिति ने इन आपूर्तियों को प्रभावित कर दिया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2023 में यूरिया का कुल आयात 21% घटा, लेकिन लंबी अवधि में यह बढ़ रहा है। FY26 में कुल आयात लगभग $18 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है, जिसमें यूरिया की हिस्सेदारी 61% होगी। यह कीमतें सरकार द्वारा नियंत्रित हैं, लेकिन आपूर्ति में कटौती और शिपिंग लागत के बढ़ने से किसान और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
भारत में कृषि अर्थव्यवस्था पर संकट का असर स्पष्ट है—खाद्य फसलें दो बार बोई जाती हैं, खारिफ और रबी, और जून/जुलाई में बीजारोपण के समय आपूर्ति में किसी भी कमी या कीमत वृद्धि किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
ऊर्जा संकट के साथ मिलकर उर्वरक आपूर्ति की अस्थिरता भारत के खाद्य सुरक्षा ढांचे पर सीधा असर डालती है, जिससे लाखों किसानों और करोड़ों उपभोक्ताओं के लिए जोखिम बढ़ गया है।