

न्यूयॉर्क: संयुक्त राष्ट्र (UN) में अमेरिका और उसके करीबी सहयोगी फ्रांस के बीच मानवाधिकार के मुद्दे पर तीखी नोकझोंक देखने को मिली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की बैठक के दौरान अमेरिकी राजनयिक फ्रांसीसी प्रतिनिधियों की टिप्पणियों से नाराज होकर बीच बैठक से बाहर निकल गए। इस घटनाक्रम को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच बढ़ते मतभेदों का संकेत माना जा रहा है।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क को दूसरा कार्यकाल दिए जाने के फैसले का अमेरिका ने विरोध किया, जबकि फ्रांस समेत अधिकांश देशों ने इसका समर्थन किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए मतदान में 144 देशों ने तुर्क के पक्ष में वोट दिया, जबकि अमेरिका उन 10 देशों में शामिल था जिन्होंने इसका विरोध किया।
इसके बाद जिनेवा स्थित फ्रांस के अमेरिकी मिशन ने सोशल मीडिया पर अमेरिका की आलोचना करते हुए लिखा कि कभी मानवाधिकारों का प्रतीक रहा अमेरिका अब उत्तर कोरिया, निकारागुआ, माली और रूस जैसे देशों के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है और दुनिया उसकी बात नहीं सुन रही।
सोमवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में अमेरिका के उप-राजदूत डैन नेग्रिया ने फ्रांस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि "अमेरिका आज भी दुनिया के लिए आजादी का सबसे बड़ा प्रतीक है।" उन्होंने फ्रांस पर राजनीतिक बयानबाजी और अपमानजनक रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जब तक फ्रांस अपनी भाषा और व्यवहार नहीं बदलता, अमेरिका उसकी ऐसी टिप्पणियां सुनने को तैयार नहीं है।
बैठक से बाहर निकलने के बाद भी अमेरिकी पक्ष ने फ्रांस पर निशाना साधा। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वाल्ट्ज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि फ्रांस दुनिया के सबसे खराब मानवाधिकार उल्लंघन करने वाले देशों के प्रति नरम रवैया अपनाता है और लोकतांत्रिक देशों को उपदेश देने का प्रयास करता है।
वहीं, फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र राजदूत जेरोम बोनाफोंट ने सीधे तौर पर अमेरिकी वॉकआउट का जिक्र नहीं किया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, मानवाधिकार और विकास को बढ़ावा देने के लिए हुई थी और फ्रांस इन्हीं मूल्यों की रक्षा के लिए काम करता रहेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल मानवाधिकारों तक सीमित नहीं है। ट्रंप प्रशासन और यूरोपीय देशों के बीच NATO, यूरोप में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी, ग्रीनलैंड और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पहले से ही मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र में हुआ यह टकराव अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती कूटनीतिक दूरी का नया संकेत माना जा रहा है।