आज के AI युग में भी बांग्ला नववर्ष पर निभाई जाती है ‘हालखाता की परंपरा’

चुनाव ने डाला है विक्रेताओं पर असर, मगर कहा-परंपरा को लेकर नहीं है परेशानी
Haalkhata Tradition Remains Alive in the Era of AI & Digital Billing
कोलकाता के नलीनी सेठ रोड पर हालखाता की दुकानों में खरीदारी करते लोग
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निधि, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : डिजिटल और एआई के इस दौर में जहां कारोबार पूरी तरह कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर पर निर्भर होता जा रहा है, वहीं बंगाल की पारंपरिक संस्कृति आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है। बांग्ला नववर्ष यानी पोइला बैसाख के अवसर पर मनाई जाने वाली हालखाता की परंपरा इसका जीवंत उदाहरण है। कोलकाता के नलिनी सेठ रोड के हालखाता के होल सेल व्यवसायियों, बरानगर तथा श्यामबाजार के विक्रेताओं का कहना है कि भले ही आज दुकानों में डिजिटल बिलिंग सिस्टम और आधुनिक सॉफ्टवेयर के जरिए हिसाब-किताब रखा जाता है, लेकिन हालखाता का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। यह केवल एक खाता नहीं, बल्कि व्यापारियों के लिए आस्था, विश्वास और रिश्तों का प्रतीक है। लाल रंग के इस खाते को बंगाल में हर घर में नववर्ष पर पूजने की परंपरा है।

व्यवसायियों व ग्राहकों ने कहा-इस परंपरा से जुड़े हैं दुनिया के कोने-कोने से लोग

व्यवसायी शिबू साहा ने कहा कि इस बार पोइला बैसाख के महीने में ही चुनाव है जिसका असल बिक्री पर पड़ा है। जैसे जो ऑर्डर मिले हैं उसे ही हम पहुंचा रहे हैं, चुनाव के कारण जो लोग दूर से यहां आकर हालखाता ले जाते थे वे इस बार आ नहीं पा रहे हैं और आसपास से लेकर ही काम चला रहे हैं। बिक्री थोड़ी कम भले ही है मगर यह थोड़ा बहुत चलता है। यह परंपरा से जुड़ा काम है जिससे हमें हर हाल में खुशी मिलती है। कोलकाता के दुकानदार दीपू ने बताया, “कार्यालयों ही नहीं बड़ी दुकानों में भी अब पूरी तरह डिजिटल सिस्टम से काम होता है, लेकिन इसके बावजूद हर साल नये हालखाता की पूजा जरूरी होती है। यह बांग्ला की संस्कृति और परंपरा का अहम हिस्सा है।” परंपरा की ही बात है कि आज भी कोई भी बांग्लाभाषी दुनिया के किसी भी कोने में क्यों ना हो, वह पोइला बैसाख पर हालखाता घर जरूर लाता है। हम प्रदेश ही नहीं पूरे देश और यहां तक के विदेशों में इसकी मांग को पूरी करते हैं। हालखाता लेने आये लोगों ने भी कहा कि बंगाल अपनी परंपराओं के लिए जाना जाता है। भले ही हम हिसाब किताब कंम्प्यूटर्स पर करें मगर लेखाजोखा की परंपरा इस खाते की है जिसकी पूजा कर ही बांग्ला नववर्ष की शुरुआत होती है।

यह है पोइला बैसाख पर निभायी जाने वाली परंपरा

चैत्र संक्रांति के बाद नये साल की शुरुआत के साथ की बांग्लाभाषियों की दुकानों व यहां तक कि घरों में भी चीजों के हिसाब किताब को लेकर नये खाते खोले जाते हैं। पुराने खाते की जगह हर साल नया हालखाता का पूजन देवी लक्ष्मी और गणेश की पूजा के साथ होता है। लोग मेहमानों, ग्राहकों को आमंत्रित कर उन्हें मिठाई खिलाते हैं। व्यवसायी पुराने बकाये का निपटारा कर नये सिरे से व्यापारिक संबंधों की शुरुआत करते हैं। स्पष्ट है कि तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद बंगाल की यह पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित है।

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