कोलकाता : जादवपुर विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी के सामने खड़ा पूर्व कुलपति गोपालचंद्र सेन का स्मारक सिर्फ एक व्यक्ति की याद नहीं, बल्कि उस दौर की गवाही है, जब विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, शिक्षक की जिम्मेदारी और छात्रों के अधिकार किसी समझौते के विषय नहीं थे। करीब छह दशक बाद भी यह स्मारक एक अनुत्तरित सवाल के साथ खड़ा है—गोपाल सेन की हत्या का न्याय आखिर कब होगा?
महात्मा गांधी की जनसभाओं में अपने हाथों से बनाए पोर्टेबल स्पीकर लेकर पहुंचने वाले गोपाल सेन तकनीक को केवल पेशा नहीं, बल्कि समाजसेवा और स्वराज का माध्यम मानते थे। जादवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय तक उनका पूरा जीवन इसी सोच का विस्तार था। मशीनों की मरम्मत से लेकर प्रोडक्शन इंजीनियरिंग की शिक्षा को संस्थागत रूप देने तक उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी।
1970 में नक्सलवादी आंदोलन के दौरान जब राजनीतिक हिंसा ने विश्वविद्यालय परिसर को घेरा, तब उन्होंने दबाव के आगे झुकने से इनकार किया। छात्रों की पुलिसिया हत्या के खिलाफ आवाज उठायी और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा की। लेकिन उसी वर्ष 30 दिसंबर को, कार्यवाहक कुलपति के रूप में उनका कार्यकाल खत्म होने के दिन, परिसर में ही उनकी हत्या कर दी गयी। वह रोज की तरह पैदल घर लौट रहे थे।
आज उनकी स्मृति विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद है, लेकिन हत्या का रहस्य और न्याय का सवाल भी उतना ही जीवित है। हाल ही में विधानसभा में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने गुरुवार को कहा कि आवश्यकता महसूस होने पर मामले की जांच के लिए आयोग गठित किया जा सकता है। यह बयान दशकों पुराने मामले को फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ले आया है। गोपाल सेन का स्मारक इसलिए महत्वपूर्ण है कि जादवपुर ने उनकी विरासत को भुलाया नहीं। अब सवाल यह है कि क्या उस विरासत को न्याय भी मिलेगा?