गहना बड़ी : आज भी जीआई टैग मिलने का है इंतजार

बंगाल की थाली में कला और स्वाद का अनोखा संगम
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कोलकाता: बंगाल की रसोई केवल स्वाद की नहीं, बल्कि कला और संस्कृति की भी वाहक रही है। इसी परंपरा का एक अनमोल उदाहरण है गहना बड़ी या गोयना बड़ी—नाम में ही जैसे इसकी विशिष्टता झलकती है। यह कोई साधारण बड़ी नहीं, बल्कि शिल्प और स्वाद का ऐसा संगम है, जो बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को थाली तक पहुंचाता है।

गहना बड़ी देखने में सचमुच गहनों जैसी लगती है। फूल, पत्ते, मछली, मोर, उल्लू, तितली—इन बारीक और सटीक आकृतियों में ढली बड़ी किसी कलाकार की कूची का कमाल प्रतीत होती है। यही कारण है कि कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने तमलुक क्षेत्र की गहना बड़ी देखकर उसकी कलात्मकता की प्रशंसा की थी और शांतिनिकेतन के कला भवन में सजाने की इच्छा जताई थी। अवनींद्रनाथ ठाकुर ने तो इसे ‘नक्शी बड़ी’ नाम दिया। सत्यजीत रे की फिल्म आगंतुक में भी इसका उल्लेख मिलता है।

मुख्यतः पूर्व मेदिनीपुर जिले—महिषादल, नंदकुमार और हल्दिया—में तैयार होने वाली गहना बड़ी सैकड़ों वर्षों पुराना कुटीर उद्योग है। सर्दी के मौसम में, परंपरागत रूप से इसे घर की महिलाएं बनाती रही हैं। रातभर भिगोई गई उड़द (बिउली) दाल को सिल-नोरों पर पीसकर, कपड़े की पोटली और नारियल की पतली लकड़ी की मदद से कांसे की थाली पर नायाब डिजाइन उकेरे जाते हैं। ऊपर से खसखस छिड़क कर धूप में सुखाया जाता है, जिससे आकृतियां और उभर जाती हैं।

स्वाद में भी यह बड़ी उतनी ही खास है। गर्म भात, सादा दाल और एक चम्मच शुद्ध घी के साथ परोसी गई गहना बड़ी, भोजन को उत्सव में बदल देती है। आज इसकी मांग केवल बंगाल तक सीमित नहीं रही बल्कि देश-विदेश में भी इसके चाहने वाले बढ़ रहे हैं। हाल के वर्षों में स्वयं सहायता समूहों और सरकारी सहयोग से इसका व्यावसायिक उत्पादन बढ़ा है।

आईआईटी खड़गपुर द्वारा जीआई टैग की प्रक्रिया शुरू होना इस परंपरा के संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम है। गहना बड़ी केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि बंगाल की विरासत, महिला सशक्तीकरण और लोककला की जीवित पहचान है—जो अब दुनिया के घर-घर पहुंचने को तैयार है।

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