देश के कोने-कोने से जुटते हैं नागा साधु
मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता
काेलकाता : गंगासागर मेले के आगमन के साथ ही आउट्राम घाट आध्यात्मिक रंग में रंगता जा रहा है, जहां मकर संक्रांति से करीब एक सप्ताह पहले देश के कोने-कोने से आनेवाले साधु यहां पहुंचकर नदी किनारे अपनी कुटिया बनाते हैं और कठिन साधना में लीन हो जाते हैं। मकर संक्रांति के पावन दिन गंगासागर में स्नान के बाद ये साधु पुनः किसी और तीर्थ की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। घाट पर धुनी जमानेवाले इन साधुओं की जीवनशैली आम लोगों के लिए कौतूहल और आत्मचिंतन का विषय बन जाती है। ठंड, कठिन परिस्थितियों और न्यूनतम साधनों के बीच रहने वाले ये नागा साधु संसार से विरक्ति और आत्मिक शांति का संदेश देते हैं।
30 साल पहले छोड़ा घर, आज भी जारी है तपस्या का सफर
आउट्राम घाट पर उत्तर प्रदेश से आये नागा साधु नारायण ने बताया कि करीब 30 साल पहले उन्होंने अपना घर-परिवार त्याग दिया था। “मैं शादीशुदा नहीं था, लेकिन जो भी धन कमाता था, अपने परिवार को देता रहा। इसके बावजूद मुझे न पहचान मिली, न संतोष। तब समझ आया कि असली शांति धन या नाम में नहीं, बल्कि त्याग में है। उनका मानना है कि आज का समाज केवल दिखावे और भौतिक सुखों में उलझा हुआ है, जबकि आत्मिक सुख का रास्ता भीतर से होकर जाता है। इसी खोज ने उन्हें नागा साधु बना दिया। झारखण्ड ने आये लालू पंडित ने कहा कि साधु-संत बनना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि मन का निर्णय होता है। जब इंसान अपने मन की सुनता है, तभी वह सही रास्ते पर चलता है। हम किसी से भागे नहीं हैं, बल्कि खुद को पाने निकले हैं।
साधु-संतों की राय : समाज को आईना दिखाते हैं ये डेरे
आउट्राम घाट पर बने ये अस्थायी डेरे केवल ठहराव की जगह नहीं, बल्कि समाज को सोचने का अवसर देते हैं। साधु-संतों का कहना है कि जीवन की भागदौड़ में इंसान अपने मूल उद्देश्य को भूलता जा रहा है। गंगासागर मेला उनके लिए सिर्फ स्नान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्ममंथन का अवसर है। गंगासागर की ओर बढ़ते इन साधुओं के कदम समाज को यह संदेश देते हैं कि त्याग में भी जीवन है और सादगी में भी सुख।