बंगाल के 'चाणक्य' मुकुल रॉय का लंबी बीमारी के बाद निधन

मुकुल रॉय के बेटे सुभ्रांशु रॉय ने बताया कि उनके पिता ने एक निजी अस्पताल में देर रात डेढ़ बजे अंतिम सांस ली। उन्होंने यह भी बताया कि वह पिछले कई दिनों से कोमा में थे।
मुकुल रॉय की फाइल फोटो।
मुकुल रॉय की फाइल फोटो।
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कोलकाताः पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के किसी समय सबसे भरोसेमंद सहयोगी और तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकार माने जाने वाले पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का रविवार देर रात यहां एक निजी अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 71 वर्ष के थे और उनके परिवार में बेटा सुभ्रांशु रॉय हैं।

सुभ्रांशु रॉय ने बताया कि मुकुल रॉय ने सॉल्ट लेक के एक अस्पताल में देर रात करीब डेढ़ बजे अंतिम सांस ली। वह कई बीमारियों से जूझ रहे थे और पिछले दो वर्षों में कई बार अस्पताल में भर्ती रहे थे। परिवार के सदस्यों ने बताया कि उन्हें मनोभ्रंश भी हो गया था और हाल ही में वह कोमा में चले गए थे। उन्होंने बताया कि मुकुल रॉय के पार्थिव शरीर को उनके आवास पर लाया जाएगा, जिसके बाद अंतिम संस्कार किया जाएगा।

अपने राजनीतिक करियर के चरम पर पश्चिम बंगाल की राजनीति के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले रॉय राज्य के अशांत राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बने रहे। वह एक ऐसे रणनीतिकार थे जो दिल्ली के सत्ता गलियारों में उतनी ही सहजता से काम करते थे जितनी कि कोलकाता के पार्टी कार्यालयों में।

ममता बनर्जी के शुरुआती साथी

पूर्व केंद्रीय मंत्री और पश्चिम बंगाल से दो बार राज्यसभा सदस्य रहे रॉय चार दशक लंबे राजनीतिक करियर में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का हिस्सा बने। उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत युवा कांग्रेस से हुई, जिसके बाद उन्होंने ममता बनर्जी के साथ हाथ मिलाया और 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। वह एक संस्थापक सदस्य के रूप में जल्द ही नवगठित पार्टी के प्रमुख संगठनात्मक स्तंभों में से एक के रूप में उभरे और बाद में इसके महासचिव के रूप में कार्य किया।

वह 2006 में राज्यसभा के लिए चुने गए और 2009 में उच्च सदन में पार्टी के नेता बने और दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख संकटमोचक के रूप में उभरे। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दूसरे कार्यकाल में जब तृणमूल एक घटक दल थी तो रॉय ने पहले जहाजरानी राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया और फिर 2012 में रेल मंत्री का पदभार संभाला।

वाममोर्चा को हराने में बड़ी भूमिका

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हलकों में रॉय ने संगठनात्मक कार्यों में पर्दे के पीछे काम करने वाले एक निपुण व्यक्ति के रूप में ख्याति अर्जित की। उन्होंने 2011 में वाम मोर्चा के 34 वर्षों के शासन को समाप्त करने वाली तृणमूल की ऐतिहासिक जीत के बाद कई जिलों में पार्टी की पकड़ मजबूत करने, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और कांग्रेस से दलबदल की निगरानी करने और नयी सरकार के राजनीतिक आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, उनका करियर विवादों से अछूता नहीं रहा। उनका नाम सारदा चिट फंड मामले और नारद स्टिंग ऑपरेशन में सामने आया था।

बंगाल में भाजपा को दी मजबूती

रॉय और तृणमूल नेतृत्व के बीच संबंध 2017 तक बिगड़ चुके थे। उसी वर्ष नवंबर में उन्होंने भाजपा में शामिल होकर राज्य के राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया। पश्चिम बंगाल में भाजपा के संगठन को मजबूत करने का जिम्मा रॉय को सौंपा गया था और पार्टी नेताओं ने उन्हें तृणमूल से दलबदल कराने और 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा का आधार बढ़ाने में मदद करने का श्रेय दिया। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 42 सीट में से 18 सीट जीतीं।

मुकुल रॉय की फाइल फोटो।
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भाजपा से दलबदल कर वापस तृणमूल में लौटें

वह 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कृष्णानगर उत्तर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा विधायक चुने गए थे। हालांकि, कुछ ही महीनों में वह तृणमूल कांग्रेस में लौट आए, जिससे कानूनी और राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। भाजपा टिकट पर चुने जाने के बाद पार्टी बदलने के कारण दलबदल विरोधी कानून के तहत अदालत ने उन्हें विधायक पद से अयोग्य घोषित कर दिया। वह तृणमूल कांग्रेस में दोबारा शामिल तो हो गए थे लेकिन उन्हें वह राजनीतिक दबदबा कभी वापस नहीं मिला जो उन्हें कभी प्राप्त था। स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ-साथ वह धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर होते चले गए।

शुभेंदु ने शोक व्यक्त किया

राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने रॉय के निधन पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘अनुभवी नेता मुकुल रॉय के निधन के बारे में जानकर मुझे गहरा दुख हुआ। उनके परिवार के प्रति मेरी हार्दिक संवेदनाएं। उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं। ओम शांति।’’

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