ईरान युद्ध में यूरोप की अहम भूमिका, ट्रंप को सहयोग की जरूरत

ईरान युद्ध में यूरोप की अहम भूमिका, ट्रंप को सहयोग की जरूरत

Donald Trump लंबे समय से यूरोप पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह अमेरिका की सुरक्षा छतरी के नीचे आराम से बैठा है।
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Donald Trump लंबे समय से यूरोप पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह अमेरिका की सुरक्षा छतरी के नीचे आराम से बैठा है। लेकिन अब जब अमेरिका ने Iran के खिलाफ खुला सैन्य अभियान शुरू किया है, तब Europe के देशों के पास वह चीज है जिसकी अमेरिका को सख्त जरूरत है—उनके सैन्य ठिकाने, हवाई क्षेत्र और रणनीतिक भूगोल।

इस सप्ताह ट्रंप ने Keir Starmer की तुलना Winston Churchill से करते हुए उनका मजाक उड़ाया और Spain को व्यापारिक प्रतिबंधों की धमकी दी। कारण यह था कि दोनों देशों ने ईरान में अमेरिकी सैन्य अभियानों को सुविधाएं देने पर कुछ सीमाएं लगा दी थीं। इसके बावजूद दोनों देशों के नेता अपने रुख पर कायम रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप अभी भी अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। NATO जैसे संस्थानों के जरिए यूरोप अमेरिका का सहयोगी है, लेकिन मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ताकत को प्रभावी बनाने के लिए यूरोप के ठिकानों और हवाई मार्गों का इस्तेमाल जरूरी होता है।

अमेरिका अक्सर जर्मनी के सैन्य लॉजिस्टिक केंद्रों, ब्रिटेन के एयर बेस और स्पेन के नौसैनिक ठिकानों का उपयोग करता रहा है। इन ठिकानों की मदद से अमेरिकी विमान बिना किसी रुकावट के उड़ान भर सकते हैं और सैनिकों तथा हथियारों की आवाजाही आसान होती है।

Ian Lesser, जो German Marshall Fund of the United States से जुड़े हैं, का कहना है कि यह स्थिति सहयोगियों के बीच भरोसे में आई कमी का संकेत है। उनके अनुसार अमेरिका को मजबूत सहयोगियों की जरूरत होती है, क्योंकि किसी भी संघर्ष की दिशा कब बदल जाए, यह कहना मुश्किल है।

यूरोप भले ही सीधे युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता, लेकिन हाल की घटनाएं उसे इस संघर्ष के करीब ले आई हैं। Cyprus में ब्रिटेन के एक सैन्य अड्डे पर ड्रोन हमला होने के बाद France, United Kingdom और Greece ने उसकी सुरक्षा के लिए कदम उठाए।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यूरोप में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों ने अमेरिका को मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में अपनी शक्ति स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई है। उदाहरण के तौर पर Ramstein Air Base (जर्मनी) और Diego Garcia जैसे ठिकानों का इस्तेमाल इराक और अफगानिस्तान युद्ध के दौरान किया गया था।

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