बंगाल में शिक्षा व्यवस्था बनी चुनावी बहस का केंद्र

स्कूलों की संख्या के मामले में राजस्थान से पिछड़ा बंगाल
बंगाल में शिक्षा व्यवस्था बनी चुनावी बहस का केंद्र
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शिक्षकों की कमी और स्थानांतरण नीति बनी बड़ी वजह            

मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों के बीच शिक्षा व्यवस्था एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन गई है। कोलकाता की तुलना में ग्रामीण जिलों की स्थिति अधिक चिंताजनक बताई जा रही है। सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी और शिक्षकों के अभाव ने पढ़ाई को प्रभावित किया है। हाल के वर्षों में हजारों स्कूलों के बंद होने की खबरों ने बहस तेज कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति शिक्षा नीति की विफलता को दर्शाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के लगातार बंद होने से छात्रों का नामांकन घटा है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में लगभग 93,715 स्कूल हैं जबकि राजस्थान में 106,302 और उत्तर प्रदेश में 262,358 स्कूल हैं। इसके बावजूद पश्चिम बंगाल में शिक्षकों की औसत उपलब्धता पांच से भी कम बताई जा रही है।

जिलों में स्कूल बंद होने की बढ़ती गंभीर समस्या

राज्य के विभिन्न जिलों में सरकारी स्कूलों के बंद होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार 8 हजार से अधिक स्कूल या तो बंद हो चुके हैं या निष्क्रिय स्थिति में हैं। भवनों की जर्जर हालत और संसाधनों की कमी प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। कई स्कूलों में पीने के पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। इसके चलते छात्रों का पलायन निजी स्कूलों की ओर बढ़ा है। राज्य में शिक्षकों की कमी लंबे समय से एक गंभीर समस्या बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों से शिक्षकों के शहरी क्षेत्रों में स्थानांतरण को प्रमुख कारण माना जा रहा है। ‘उत्सश्री’ जैसी स्थानांतरण योजनाओं के कारण कई जिलों में स्कूलों में शिक्षकों की संख्या घट गई है। परिणामस्वरूप कई कक्षाएं बिना शिक्षकों के चल रही हैं। एक शिक्षक पर कई कक्षाओं की जिम्मेदारी आ गई है।

बंगाल के स्कूलों की बदहाल स्थिति पर बड़ा बयान

हेडमास्टर्स एसोसिएशन के नेता चंदन माइती ने स्थिति पर बड़ा बयान देते हुए कहा कि वोट डालने से पहले मतदाताओं को स्कूलों की जमीनी हालत पर जरूर ध्यान देना चाहिए। पूरे बंगाल में ऐसी स्थिति है कि कहीं एक ही शिक्षक 100 छात्रों को पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूलों में पीने का पानी, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। अगर यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में स्कूलों में छात्र ही नहीं बचेंगे।

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