

मेनू में बदलाव, परांठा-सब्जी की जगह सैंडविच और हल्का नाश्ता
मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और गैस आपूर्ति संकट के कारण कोलकाता के स्कूलों और हॉस्टलों में इन दिनों एलपीजी गैस की भारी कमी देखने को मिल रही है। इसका असर आम घरों के साथ-साथ हॉस्टल, मेस और छोटे रेस्टोरेंट पर भी साफ दिखाई दे रहा है। गैस सिलेंडर समय पर नहीं मिलने के कारण कई जगहों पर खाना बनाने के लिए कोयला और लकड़ी का सहारा लेना पड़ रहा है। हॉस्टल संचालकों का कहना है कि अगर जल्द सप्लाई सामान्य नहीं हुई तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
इलेक्ट्रिक चूल्हे भी नहीं मिल रहे पर्याप्त
वान्याज पीजी के संचालक राहुल मेहरा ने बताया कि मेस करीब 8 साल से चल रही है और यहां रोजाना लगभग 150 से 200 छात्रों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। गैस की कमी को देखते हुए उन्होंने इलेक्ट्रिक चूल्हे का इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन बाजार में वह भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। ऐसे में केवल एक-दो इलेक्ट्रिक चूल्हों से इतने बच्चों का खाना बनाना संभव नहीं है। इसलिए अब पारंपरिक तरीके से कोयले और लकड़ी के चूल्हे पर भोजन तैयार किया जा रहा है।
एक-दो दिन की गैस बची, फिर कोयले का सहारा
भैया गर्ल्स पीजी के संचालक मनोज पांडे ने बताया गैस की कमी के कारण अब खाना बनाना काफी मुश्किल हो गया है। फिलहाल उनके पास केवल एक या दो दिन के लिए ही एलपीजी गैस बची हुई है। इसके बाद उन्होंने पहले से ही मिट्टी का चूल्हा तैयार कर रखा है जिस पर कोयले से खाना बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं आई थी कि छात्रों के लिए लकड़ी या कोयले के चूल्हे पर खाना बनाना पड़े। राधिका पीजी के संचालक मनोज दास ने बताया कि उनके यहां करीब 150 छात्रों के लिए दिन में 3 बार खाना बनता है। गैस की कमी के कारण अब मेनू में भी बदलाव करना पड़ा है। पहले सुबह छात्रों को परांठा-सब्जी दिया जाता था, लेकिन अब उसकी जगह सैंडविच और हल्का नाश्ता दिया जा रहा है ताकि कम समय और कम ईंधन में भोजन तैयार किया जा सके।
किसी तरह जारी है भोजन की व्यवस्था
संचालकों का कहना है कि कठिन परिस्थिति के बावजूद वे छात्रों के भोजन को बंद नहीं करना चाहते। इसलिए लकड़ी, कोयले और सीमित गैस के सहारे किसी तरह भोजन तैयार किया जा रहा है। हालांकि अगर जल्द ही एलपीजी की सप्लाई सामान्य नहीं हुई तो आने वाले दिनों में हॉस्टल और मेस संचालकों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।