

दिल्ली में BRICS Summit के दौरान भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि वह रूस और चीन के साथ अपने रिश्तों को कैसे संभालता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली बातचीत पर खास नजर रहेगी। इसके साथ व्यापार, ऊर्जा और दूसरे देशों के साथ रुपये समेत स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने के मुद्दे भी अहम होंगे।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 11 सितंबर को दिल्ली पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बातचीत में दोनों देशों के रिश्तों के कई अहम मुद्दे सामने आ सकते हैं। इनमें रक्षा, तेल, उर्वरक, परमाणु ऊर्जा, व्यापार और जरूरी खनिज शामिल हैं।
भारत के लिए रूस से रिश्ते केवल रक्षा तक सीमित नहीं हैं। रूस से मिलने वाला तेल और उर्वरक भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच कारोबार और ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाना भारत की बड़ी जरूरत है।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत भी इस बैठक का अहम हिस्सा होगी। भारत और चीन के रिश्तों में सीमा विवाद के कारण पिछले कुछ वर्षों में तनाव रहा है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखना जरूरी है।
ऐसे में मोदी-शी बातचीत से यह संकेत मिल सकता है कि दोनों देश अपने रिश्तों को आगे किस तरह संभालना चाहते हैं। हालांकि सीमा से जुड़े मुद्दे अभी भी दोनों देशों के बीच बड़ी चुनौती हैं।
BRICS के आर्थिक मुद्दों में स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने BRICS Business Forum में सदस्य देशों के बीच भुगतान व्यवस्था को जोड़ने और कारोबार को आसान बनाने पर जोर दिया।
भारत UPI जैसे अपने डिजिटल भुगतान सिस्टम को दूसरे देशों के साथ जोड़ने की संभावनाएं भी तलाश रहा है। इससे देशों के बीच सीधे भुगतान करना आसान हो सकता है और कारोबार की लागत घट सकती है।
हालांकि स्थानीय मुद्रा में कारोबार और BRICS की साझा मुद्रा एक ही बात नहीं है। BRICS की कोई साझा मुद्रा अभी शुरू नहीं हुई है। फिलहाल जोर इस बात पर है कि अलग-अलग देशों की भुगतान व्यवस्था को बेहतर तरीके से जोड़ा जाए।
भारत रूस के साथ अपने पुराने रिश्ते बनाए रखना चाहता है। वहीं चीन के साथ सीमा विवाद के बावजूद बातचीत जारी रखना चाहता है। इसके साथ अमेरिका और यूरोप के साथ भी भारत के व्यापार और दूसरे रिश्ते महत्वपूर्ण हैं।
यानी भारत को सभी बड़े देशों के साथ अपने हित के हिसाब से रिश्ते संभालने हैं। BRICS इस मामले में भारत को रूस और चीन के साथ सीधे बातचीत का मौका देता है।
पश्चिम एशिया में तनाव और रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच तेल की कीमत और समुद्री रास्तों की सुरक्षा भारत के लिए बड़ी चिंता है। तेल की कीमत बढ़ने या सामान की आवाजाही प्रभावित होने का सीधा असर भारतीय बाजार और महंगाई पर पड़ सकता है।
इसीलिए भारत चाहता है कि ऊर्जा की सुरक्षित आपूर्ति और जरूरी सामान की आवाजाही बनाए रखने के लिए देशों के बीच सहयोग बढ़े।
दिल्ली Summit के दौरान सबसे ज्यादा नजर मोदी-पुतिन बातचीत, मोदी-शी मुलाकात, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार, भुगतान व्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर रहेगी। इसके अलावा नई दिल्ली घोषणा में व्यापार और दुनिया में चल रहे संघर्षों पर सदस्य देशों का क्या रुख सामने आता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
भारत के लिए इस बैठक की सफलता केवल बड़े बयानों से तय नहीं होगी। असली सवाल यह होगा कि क्या बैठक के बाद व्यापार, भुगतान और ऊर्जा जैसे मुद्दों पर कुछ ठोस कदम सामने आते हैं।