'दीदी, इछामती को बचा लीजिए'

मुख्यमंत्री को बनगांव का भावनात्मक संदेश
इछामती नदी
इछामती नदी
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कोलकाता: SIR विरोधी आंदोलन के बीच मंगलवार को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लंबे अरसे बाद बनगांव पहुंचीं। त्रिकोण पार्क से उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला, लेकिन स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद इछामती नदी पर कोई घोषणा उनके भाषण में नहीं हुई।

सीमावर्ती शहर 'बनगांव की धड़कन' इछामती नदी लगभग 216 किलोमीटर लंबी है। इसका स्रोत नदिया जिले में स्थित एक स्थान पर था, जहां से यह भारत और बांग्लादेश के बीच बहते हुए फिर भारत की सीमा में प्रवेश करती थी। कभी यह नदी बनगांव, बागदा और गाईघाटा क्षेत्रों की जीवनरेखा थी।

व्यापार, नौकायन, मछली पकड़ने से लेकर शहर की जलनिकासी तक, इछामती कई तरह से स्थानीय जीवन का आधार थी। लेकिन समय के साथ नदी अपना अस्तित्व खोती चली गई। पली, कचरे और जलकुंभी की मोटी परतों ने इसे लगभग समाप्त कर दिया है। कई जगह नदी का अस्तित्व ही पहचान में नहीं आता—जैसे किसी खेत पर घास उग आई हो। मछुआरे पेशा छोड़ रहे हैं और नदी के किनारे रहने वाले लोग मच्छरों और सांपों के हमलों से परेशान हैं।

नगरपालिका के चेयरमैन गोपाल सेठ ने सिंचाई मंत्री को पत्र भेजकर इछामती के पुनरुद्धार का अनुरोध किया था। विभाग की ओर से जवाब मिला कि विभिन्न दफ्तरों को कार्रवाई के लिए पत्र भेजे गए हैं। अनुमान है कि स्रोत पुनर्जीवन, सफाई और जलकुंभी हटाने में करीब 50 करोड़ रुपये खर्च होंगे, लेकिन जमीन पर अब तक कोई काम शुरू नहीं हुआ।

स्थानीय निवासी सुबिमल चौधरी कहते हैं, 'कभी इस नदी में ज्वार-भाटा देखा जाता था, अब सिर्फ जलकुंभी दिखती है। यह कभी जीवन-यापन का साधन थी, आज भय का कारण बन गई है। अगर मुख्यमंत्री चाहें तो वह इछामती को बचा सकती हैं।' स्थानीय कलाकार कार्तिक मंडल कहते हैं, 'सोचा था दीदी (ममता बनर्जी) इछामती को लेकर कुछ घोषणाए करेंगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। नदी का पुनरुद्धार नहीं होने से हर साल जलभराव होता है। शहर की नालियों का बोझ वह उठा ही नहीं पाती।'

वर्ष 2022 में मुख्यमंत्री द्वारा इछामती के नाम पर एक नया और अलग जिला घोषित किया गया था जिससे लोगों को उम्मीद बंधी थी लेकिन आज भी यह नदी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। मुख्यमंत्री की यात्रा के बाद पूरे बनगांव में सिर्फ एक ही सवाल उठ रहा है— क्या दीदी इछामती को भूल गईं?

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