

मुनमुन, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : राज्य के कई सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों में छात्रों की घटती उपस्थिति को लेकर शैक्षणिक जगत में गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है। कागजों पर उपस्थिति दर संतोषजनक दिखाई देती है, लेकिन वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग बताई जा रही है। कई कॉलेजों में कक्षाएं लगभग खाली रहती हैं और शिक्षकों को अक्सर पढ़ाए बिना ही लौटना पड़ता है। जानकारी के अनुसार, राज्य के लगभग 400 सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों में से अधिकांश इस समस्या से जूझ रहे हैं। आरोप है कि कुछ संस्थानों में छात्रों की वास्तविक उपस्थिति 40 प्रतिशत से भी कम रह गई है। यह स्थिति केवल शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि उपनगरों और ग्रामीण क्षेत्रों के कॉलेजों में भी समान रूप से देखने को मिल रही है।
कम उपस्थिति के बावजूद छात्र कैसे दे रहे परीक्षा?
शिक्षण समुदाय के कुछ सदस्यों का कहना है कि पुरुष छात्रों की तुलना में महिला छात्रों की उपस्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। उनका मानना है कि कई छात्र नियमित रूप से कॉलेज नहीं आते, जिससे शिक्षण प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। नियमों के अनुसार, कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेजों में छात्रों को परीक्षा में बैठने के लिए प्रत्येक विषय में कम से कम 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है। इसके बावजूद कम उपस्थिति वाले छात्र हर वर्ष परीक्षा में शामिल कैसे हो पा रहे हैं, यह एक बड़ा सवाल बन गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि वह इस स्थिति से अवगत है। हालांकि, रिकॉर्ड में उपस्थिति सही दर्ज होने के कारण वास्तविक स्थिति की पुष्टि करना मुश्किल हो जाता है। शिक्षण समुदाय के एक वर्ग का यह भी दावा है कि यूनिवर्सिटी ऑफ बर्दवान, यूनिवर्सिटी ऑफ कल्याणी और वेस्ट बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी से संबद्ध कॉलेजों में भी उपस्थिति की स्थिति संतोषजनक नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समस्या पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका असर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।