नई दिल्ली/नागपुर : कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर में कथित तौर पर अनधिकृत प्रवेश करने और शांति बनाए रखने के बांड का उल्लंघन करने के आरोप में बुधवार को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इस कार्रवाई के बाद पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार पर देश में ‘अघोषित आपातकाल’ लागू करने का आरोप लगाया। इस बीच, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक और कानूनी विरोध भी तेज हो गया है। असदुद्दीन ओवैसी ने एसआईआर की प्रक्रिया को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है, जबकि दिशल्ली में इससे संबंधित एक अन्य याचिका पर शीर्ष अदालत 28 अक्टूबर को सुनवाई करेगा।
दिल्ली पुलिस के अनुसार, सौरव दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे और कॉजपा के 11 अन्य सदस्य 13 अक्टूबर की सुबह एक निजी परिसर से गुजरते हुए जंतर-मंतर में दाखिल हुए थे। पुलिस का कहना है कि जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया जा चुका है। प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर बैरिकेड पार किए, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए नारे लगाए और राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
पुलिस ने बताया कि मौके पर तैनात कर्मियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर सरकारी कर्मचारियों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से बाधित किया। सभी 14 लोगों को हिरासत में लिया गया और 13 अक्टूबर को कनॉट प्लेस तथा संसद मार्ग थानों में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत दो प्राथमिकी दर्ज की गईं।
पुलिस के मुताबिक, दास, रांका और शिंदे को सार्वजनिक शांति भंग करने की आशंका के मद्देनजर एहतियातन गिरफ्तार किया गया। उनके खिलाफ अनधिकृत प्रवेश, निषेधाज्ञा के उल्लंघन, शांति बनाए रखने के बांड का उल्लंघन करने और सरकारी कर्मचारियों को काम करने से रोकने सहित विभिन्न आरोप लगाए गए।
तीनों को बुधवार सुबह विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। अदालत ने निवारक पुलिस रिपोर्ट और दोबारा कानून तोड़ने की आशंका को ध्यान में रखते हुए दास और रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। दोनों को तिहाड़ जेल में रखा गया है।
उनके सहयोगी अजिंक्य शिंदे को छह महीने तक शांति बनाए रखने और अच्छा व्यवहार करने के लिए पांच हजार रुपये के निजी मुचलके तथा इतनी ही राशि की जमानत पर पाबंद कर रिहा कर दिया गया। पुलिस ने सोशल मीडिया के जरिए अन्य लोगों को भी कथित तौर पर ऐसी गतिविधियों के लिए उकसाने के प्रयासों का उल्लेख किया। तीनों के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 126 और 170 के तहत निवारक कार्यवाही भी शुरू की गई।
कॉजपा संस्थापक अभिजीत दीपके ने नागपुर में पत्रकारों से बातचीत में दास और रांका की हिरासत पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर असहमति की आवाज दबाने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार देश में आपातकाल लागू करना चाहती है, तो उसे इसकी आधिकारिक घोषणा करनी चाहिए। दीपके ने दावा किया कि जंतर-मंतर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए पार्टी के नेताओं को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजना दमनकारी रवैये को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि देश संविधान और डॉ. बी. आर. आंबेडकर के विचारों से चलता है और किसी भी संगठन की विचारधारा देश पर थोपने की कोशिश सफल नहीं होगी। दीपके बाद में नागपुर स्थित दीक्षाभूमि पहुंचे, जहां 14 अक्टूबर 1956 को डॉ. आंबेडकर ने अपने हजारों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था।
विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के प्रदर्शनों पर दीपके ने कहा कि कॉजपा सत्ता पक्ष पर दबाव बनाने वाला एक स्वतंत्र समूह है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी की स्वतंत्र पहचान होने के बावजूद उसके आंदोलन और ‘इंडिया’ गठबंधन के प्रदर्शनों का उद्देश्य एक ही है।
उच्चतम न्यायालय तक विपक्षी नेताओं के मार्च पर सवाल पूछे जाने पर दीपके ने शीर्ष अदालत की भूमिका की आलोचना की। उन्होंने मतदाता सूचियों से कथित तौर पर नाम हटाए जाने के मामलों में अदालत के रुख पर भी सवाल उठाए।
विदेश से प्रदर्शनकारियों को धन मिलने के दावों पर उन्होंने पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे से कहा कि यदि उनके पास इसके सबूत हैं, तो वे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सौंपें। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के विपक्ष पर पाकिस्तान की भाषा बोलने के आरोप पर दीपके ने कहा कि उन्हें किसानों की समस्याओं और राज्य में सूखे की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह दिल्ली में एसआईआर के दौरान मतदाताओं को जारी किए गए नोटिसों की सूची और उन्हें जारी करने के स्पष्ट कारण सार्वजनिक करने के अनुरोध वाली याचिका पर 28 अक्टूबर को सुनवाई करेगा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया। उन्होंने निर्वाचन आयोग को निर्देश देने का अनुरोध किया कि एसआईआर के तहत दिल्ली की मतदाता सूची से हटाए गए नामों को दोबारा शामिल कराने के लिए उचित व्यवस्था की जाए। इसके लिए पहले से पंजीकृत मतदाताओं से यह घोषणा नहीं मांगी जानी चाहिए कि वे पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर रहे हैं।
भूषण ने बताया कि दिल्ली में एसआईआर के तहत दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की समयसीमा 30 अक्टूबर तक बढ़ा दी गई है। इसके बाद अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। उन्होंने पहले सुनवाई कराने का अनुरोध किया, जिस पर पीठ ने 28 अक्टूबर की तारीख तय की। पीठ ने यह भी कहा कि वह ऐसी व्यवस्था के लिए आदेश पारित करने पर विचार कर रही है, जिससे मौजूदा स्थिति से निपटा जा सके।
निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अवधि एक महीने बढ़ाई थी। अब अंतिम मतदाता सूची चार दिसंबर को प्रकाशित की जानी है।
शीर्ष अदालत ने 22 सितंबर को अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी की याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई थी। इसमें मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगतियों’ की श्रेणी में रखने के लिए अपनाए गए मानदंडों, परिभाषाओं और कार्यप्रणाली संबंधी दिशा-निर्देशों का खुलासा करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने एक अतिरिक्त आवेदन दाखिल कर अनुरोध किया है कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं को प्रपत्र-छह में ऐसी घोषणा देने के लिए बाध्य न किया जाए, जो उन पर तथ्यात्मक रूप से लागू नहीं होती। उन्होंने ऐसे मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल करने के लिए उचित प्रपत्र या घोषणा निर्धारित करने की भी मांग की है।
निर्वाचन आयोग ने 31 अगस्त को दिल्ली की मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की थी, जिसमें कुल 1.45 करोड़ मतदाताओं में से 47 लाख के नाम हटा दिए गए थे।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार को एसआईआर की वर्तमान प्रक्रिया और उसके तौर-तरीकों को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया। शीर्ष अदालत इस याचिका पर पहले से लंबित इसी मुद्दे से संबंधित अन्य याचिकाओं के साथ सुनवाई करने के लिए सहमत हो गई है।
ओवैसी की ओर से पेश अधिवक्ता निजामुद्दीन पाशा ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ से अनुरोध किया कि उनकी याचिका को उन मामलों के साथ सूचीबद्ध किया जाए, जिन पर बृहस्पतिवार को सुनवाई होनी है। उन्होंने बताया कि याचिका एसआईआर लागू करने के तौर-तरीकों से संबंधित है।
पीठ ने संकेत दिया कि वह इस याचिका और इसी तरह के अन्य मामलों पर विचार करेगी। यह याचिका ऐसे समय में आई है, जब एसआईआर की प्रक्रिया और इसके कारण मतदाता सूची से कथित तौर पर नाम हटाए जाने को लेकर कानूनी चुनौती बढ़ रही है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्ष के 10 प्रमुख नेताओं ने भी एसआईआर तथा उससे जुड़ी प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर शीर्ष अदालत में याचिकाएं दायर की हैं। विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ संयुक्त रूप से भी कानूनी कदम उठाए हैं।
एसआईआर को लेकर जारी विवाद अब सड़कों पर विरोध प्रदर्शन से लेकर अदालतों में सुनवाई तक पहुंच गया है। जहां कॉजपा नेताओं की हिरासत ने राजनीतिक टकराव को बढ़ाया है, वहीं मतदाता सूची में नामों को शामिल करने और हटाने की प्रक्रिया पर उठे सवाल निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बहस के केंद्र में हैं।