

नई दिल्ली : भाजपा ने तीन महीने पहले ही बंगाल में प्रचंड जीत हासिल करके सरकार बनाई थी, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखी है। बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया समेत तीन सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को 2-1 से झटका लगा है। भाजपा बांकीपुर की वह सीट उपचुनाव में हार गई, जहां से राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 20 साल तक विधायक रहे थे। उनसे पहले उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा 11 साल विधायक थे। इस तरह 30 साल पुराना इतिहास बांकीपुर में बदल गया है। वहां पीके बांकीपुर के बांकुरे बनकर उभरे हैं। इसके अलावा दतिया में भाजपा के आशुतोष तिवारी को हार मिली है और उनके स्थान पर कांग्रेस के घनश्याम सिंह को जीत मिली है।
प्रशांत किशोर के लिए कितनी जरूरी थी जीत ?
बांकीपुर उपचुनाव में 31 राउंड की काउंटिंग हुई, इस दौरान एक बार भी भाजपा उम्मीदवार ने लीड नहीं किया। ये भाजपा के लिए सबसे बड़ा सेटबैक है। जन सुराज की साख और बिहार की राजनीति के लिए बांकीपुर की जीत काफी मायने रखती है। बांकीपुर उपचुनाव जन सुराज पार्टी और प्रशांत किशोर दोनों के राजनीतिक भविष्य के लिए अग्निपरीक्षा थी। बांकीपुर पिछले तीन दशकों से भाजपा का अभेद्य किला रहा है। यहां मिली जीत ने ये साबित किया कि जन सुराज पारंपरिक वोट बैंक को ध्वस्त करने में सक्षम है।
हार ने मंथन के लिए मजबूर किया
उधर, मध्य प्रदेश में घनश्याम सिंह 72 साल के नेता हैं और पहले भी दो बार विधायक रहे हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की सीट के तौर पर चर्चित रही दतिया से भाजपा की हार ने भोपाल से दिल्ली तक नेतृत्व को मंथन के लिए मजबूर किया है। हालांकि भाजपा को गुजरात की मांजलपुर सीट पर जीत मिली है। यहां पार्टी के कैंडिडेट सतीश पटेल को 30630 वोटों से जीत मिली है। इसके साथ ही यहां भाजपा का दबदबा कायम रहा है। भाजपा की इस विधानसभा में यह लगातार 9वीं जीत है। इस सीट पर भाजपा के ही विधायक योगेश पटेल के निधन के बाद चुनाव हुआ था। 2012 के चुनाव से पहले तक वडोदरा शहर की इस सीट को रावपुरा के नाम से जाना जाता था, लेकिन 2008 के परिसीमन में नाम बदला और यह सीट मांजलपुर कहलाई।
एक बार फिर भाजपा ने अपने इस गढ़ को बचा लिया है। इस तरह तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को 2-1 से झटका लगा है। हालांकि मांजलपुर में भी भाजपा की जीत का अंतर कम हुआ है। ऐसा इसलिए क्योंकि योगेश पटेल को 2022 में 1 लाख वोटों से जीत मिली थी, लेकिन इस बार आंकड़ा 30 हजार पर ही सिमट गया। अब देखना होगा कि भाजपा की ओर से बांकीपुर और दतिया की हार के बाद क्या फैसले लिए जाते हैं।