

दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाली 18वीं BRICS शिखर बैठक ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया कई मोर्चों पर अस्थिरता से जूझ रही है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध, बढ़ते व्यापारिक तनाव, ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में बदलाव ने देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
ऐसे माहौल में भारत की मेजबानी में हो रही BRICS बैठक केवल नेताओं की मुलाकात नहीं है। यह इस बात की परीक्षा भी है कि तेजी से बदलती दुनिया में यह समूह अपनी भूमिका कितनी मजबूत कर सकता है।
BRICS अब वह छोटा समूह नहीं रहा, जिसमें कभी केवल ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। दक्षिण अफ्रीका के बाद समूह का विस्तार हुआ और अब इसमें 11 सदस्य देश हैं—ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।यही वजह है कि BRICS को अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह मानना पर्याप्त नहीं होगा।
BRICS शब्द की शुरुआत किसी सरकार ने नहीं की थी। 2001 में Goldman Sachs के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने एक आर्थिक अध्ययन में BRIC शब्द का इस्तेमाल किया था। उस समय इसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे।
2006 में चारों देशों ने मिलकर औपचारिक सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाया और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला BRIC शिखर सम्मेलन हुआ। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS हो गया।
समय के साथ इसका दायरा बढ़ता गया। अब समूह में 11 सदस्य देश हैं। इनके अलावा 10 साझेदार देश भी हैं—बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम।यानी BRICS का विस्तार केवल संख्या में नहीं हुआ है। इसके साथ इसका आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व भी बढ़ा है।
18वीं BRICS बैठक का मुख्य कार्यक्रम 12 और 13 सितंबर को भारत मंडपम में होगा। बैठक में वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने, बहुपक्षवाद को मजबूत करने और विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने पर चर्चा होगी।
इसके साथ व्यापार और निवेश, तकनीक, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन और महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रहेंगे।
बैठक के अंत में नई दिल्ली घोषणा जारी किए जाने की योजना है।
भारत ने इस बार BRICS की कार्यसूची में एक महत्वपूर्ण शब्द रखा है—लचीलापन (flexible)। इसका मतलब है कि युद्ध, महामारी, प्राकृतिक आपदा या व्यापारिक संकट जैसी परिस्थितियों में देशों की अर्थव्यवस्थाएं और आपूर्ति व्यवस्था कितनी मजबूती से टिक सकती हैं।
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है, लेकिन इसका जवाब सीधा नहीं है।
BRICS को औपचारिक रूप से पश्चिम के खिलाफ कोई सैन्य या राजनीतिक गठबंधन नहीं कहा जा सकता। समूह का घोषित उद्देश्य आर्थिक सहयोग बढ़ाना, विकासशील देशों की आवाज मजबूत करना और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करना है।
लेकिन वास्तविकता यह है कि BRICS के कई प्रमुख सदस्य देशों के पश्चिम के साथ गंभीर मतभेद हैं। रूस और ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंध हैं। चीन और अमेरिका के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी हुई है।
दूसरी ओर भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ब्राजील जैसे देशों के पश्चिमी देशों के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं।
यानी BRICS के भीतर सभी देशों के हित एक जैसे नहीं हैं। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।
BRICS जितना बड़ा हुआ है, उतना ही विविध भी हो गया है। 11 देशों के हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं।
किसी के लिए ऊर्जा सबसे बड़ा मुद्दा है, किसी के लिए व्यापार। किसी की प्राथमिकता डॉलर पर निर्भरता कम करना है तो किसी के लिए पश्चिमी बाजारों तक पहुंच बनाए रखना।
इसलिए दिल्ली बैठक की सफलता का पैमाना केवल बड़े-बड़े राजनीतिक बयान नहीं होंगे।असली सवाल यह होगा कि क्या सदस्य देश ठोस फैसले कर पाते हैं।
क्या भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की दिशा में वास्तविक प्रगति होगी? क्या स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने के लिए कोई व्यावहारिक व्यवस्था बनेगी? क्या व्यापारिक बाधाएं कम होंगी? क्या महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करने पर सहमति बनेगी? और क्या वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए BRICS कोई ठोस रास्ता दिखा पाएगा?
BRICS की अगली कहानी इन्हीं सवालों से तय होगी।