निधि, सन्मार्ग संवाददाता
बारासात : दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर जहां लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ त्योहार का आनंद लेते हैं, वहीं उत्तर 24 परगना के अशोकनगर की महिला ढाकी (ढोल बजाने वाली) अपने कंधों पर ढाक टांगे पूजा पंडालों की ओर निकल पड़ी हैं। अपनी कड़ी मेहनत और ढाक की मनमोहक ताल से ये महिलाए दूसरों के जीवन में उत्सव का उजाला फैला रही हैं। इसके साथ ही प्राप्त आमदनी से वे अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति को सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। बता दें कि अशोकनगर के कयाडांगा नटुपाड़ा के रहने वाले प्रसिद्ध ढाकी सजल नंदी पिछले कुछ वर्षों से इन महिलाओं को ढाक बजाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। उनके इस विशेष दल में आज लगभग 150 महिला ढाकी शामिल हो चुकी हैं। ये महिलाएं केवल ढाक ही नहीं बजातीं, बल्कि सिर पर कुलो (सूप), उस पर कलश और बैटरी से जलती रोशनियों के साथ थिरकते हुए अनोखा नृत्य भी प्रस्तुत करती हैं।
ढोल की हर थाप से बदल रहीं वे अपने परिवार की तकदीरें
उनकी यह अनूठी प्रस्तुति और ढोल बजाने का शानदार अंदाज दर्शकों का मन मोह लेता है। आर्थिक रूप से साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली रंजना, सुमित्रा, करुणा, गीता और अंजना नंदी जैसी महिला ढाकी इस बार भी त्योहार के दौरान अतिरिक्त कमाई की उम्मीद में समूहों में निकल पड़ी हैं। इनकी कला का जादू केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी फैल चुका है। अंजना नंदी और करुणा पाल जहां छत्तीसगढ़ के पूजा पंडालों में अपनी कला का प्रदर्शन कर रही हैं, वहीं कई दिल्ली में और कुछ टीम न्यू टाउन सर्बजनीन दुर्गोत्सव समिति के पंडालों में अपनी प्रस्तुति दे रही है। ढाक बजाकर मिलने वाली आय इन महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है, बल्कि समाज में उन्हें एक नया आत्मसम्मान और नई पहचान भी दिला रही है।