GI टैग से चमका बंगाल,अब विरासत को नया विस्तार देने की तैयारी

बंगाल अपने कई प्रोडक्ट पर GI टैग के लिए कर रहा है फोकस
पुरुलिया का छउ मास्क जिसे सालों पहले मिला चुका जीआई टैग
पुरुलिया का छउ मास्क जिसे सालों पहले मिला चुका जीआई टैग
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सबिता राय, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : बंगाल अपनी कला और संस्कृति से लेकर खाद्य सामग्री सहित विभिन्न स्तर पर दुनियाभर में मशहूर है। राज्य सरकार राज्य की पारंपरिक कला, हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के उद्देश्य से भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग पर विशेष जोर दे रही है। अब तक बंगाल के 36 कला रूपों और उत्पादों को GI टैग मिल चुका है, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विशिष्ट पहचान को दर्शाता है।

कई आइटम्स में उपलब्धि पाने की तैयारी

अब सरकार नये कई आइटम्स में यह उपलब्धि पाने के लिए तैयारी में जुटी हुई है। इनमें खाद्य आइटम से लेकर कला संस्कृति शामिल हैं। प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इनमें बंगाल का पान, कृष्णानगर का माटी पुतुल और राज्य का चनाचूर सहित कई चीजें शामिल हैं।

मंत्री उज्ज्वल विश्वास
मंत्री उज्ज्वल विश्वास

क्या कहना है मंत्री का

राज्य सरकार अब और भी कई उत्पादों को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया में जुटी है। इसके लिए संबंधित राज्य का विभाग साइंस और टेक्नोलॉजी व बायो टेक्नोलॉजी काम कर रहे हैं। विभाग के मंत्री उज्ज्वल विश्वास ने सन्मार्ग से खास बातचीत में बताया कि हमलोग कई नये प्रोडक्ट पर काम कर रहे हैं। जल्द ही उम्मीद करते हैं कि अच्छी खबर आयेगी। लक्ष्य है कि आने वाले समय में बंगाल के और अधिक पारंपरिक उत्पाद GI सूची में शामिल हों।

अब तक इन्हें मिला है GI टैग

अब तक बंगाल के 36 कला रूपों और उत्पादों को GI टैग मिल चुका है। बंगाल को अब तक जिन उत्पादों पर GI टैग मिला है, उनमें दार्जिलिंग चाय, बंगाल का रसगुल्ला, मालदह का आम (लक्ष्मणभोग से लेकर अन्य कई), जयनगर का मोआ, बर्दवान का सीताभोग व मेहीदाना, गोविंदभोग चावल, बांकुड़ा का टेराकोटा, छऊ मास्क, शांतिनिकेतन की चमड़े की कारीगरी, बलूचरी साड़ी, तांत साड़ी, सुंदरवन का मधु, विष्णुपुर का मोतीचूर लड्डू, बारुईपुर का प्यारा, मुर्शिदाबाद का छानाबड़ा, दार्जिलिंग का मंदारिन संतरा सहित अन्य कई शामिल हैं। हाल में दार्जिलिंग के मंदारिन संतरे को जीआई टैग मिला है।

क्या लाभ होता है GI टैग मिलने से

GI टैग मिलने से किसी भी उत्पाद को उसके भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ा जाता है, जिससे उसकी मौलिकता और गुणवत्ता की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित होती है। इससे जुड़े कारीगरों, किसानों और उत्पादकों को बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिलता है। नकली उत्पादन से भी बचा जाता है। स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। GI टैग मिलने के बाद उत्पादों की मांग और निर्यात में वृद्धि हाेती है। इतना ही नहीं, नयी पीढ़ी को पारंपरिक शिल्प और कला से जोड़ने में भी यह मददगार साबित हो सकता है।

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