ताम्रपत्र तो मिल गए, मगर विदेश में अब भी कैद हैं भारत की 10 कलात्मक धरोहरें

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विदेश में अब भी कैद हैं भारत की 10 धरोहरेंइंटरनेट से साभार
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नई दिल्ली : भारत का इतिहास त्याग, बलिदान और अमूल्य विरासतों की दास्तान है। सदियों की गुलामी के दौरान देश ने न केवल अपनी स्वतंत्रता खोई, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और अनमोल धरोहरों को भी लुटते देखा। आज जब भारत वैश्विक पटल पर एक नई शक्ति बनकर उभर रहा है, तो विदेशों में कैद हमारी ये ऐतिहासिक निशानियां भी धीरे-धीरे अपने वतन लौटने लगी हैं। हाल ही में नीदरलैंड द्वारा चोल राजवंश के 11वीं शताब्दी के ऐतिहासिक ताम्रपत्रों को वापस सौंपना और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्देश के बाद धार की भोजशाला में स्थापित माँ वाग्देवी (सरस्वती) की 1034 ईस्वी की मूल मूर्ति को लंदन से भारत लाने की तेज होती मांग, इसी बदलते दौर का प्रतीक हैं। लेकिन माँ वाग्देवी की इस प्रतिमा और चोल ताम्रपत्रों के अलावा भी ऐसी कई बेशकीमती कलाकृतियां (आर्टिफैक्ट्स) हैं, जो आज भी सात समंदर पार भारत वापसी की राह देख रही हैं। आइए, नजर डालते हैं देश की उन 10 सबसे प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों पर जो इस वक्त विदेशी संग्रहालयों और तिजोरियों की शोभा बढ़ा रही हैं:

1. कोहिनूर हीरा (Koh-i-Noor)

यह दुनिया का सबसे प्रसिद्ध और विवादित हीरा है, जो कभी भारत की गोलकुंडा खदानों से निकला था। काकतीय, खिलजी, मुगल, अफगान और सिख शासकों से होते हुए यह हीरा आखिरकार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ लगा। वर्तमान में यह बेशकीमती हीरा महारानी एलिजाबेथ के शाही मुकुट का हिस्सा है और लंदन के 'टावर ऑफ लंदन' में सुरक्षित रखा गया है। भारत लंबे समय से इसे वापस लाने की मांग कर रहा है।

2. सुल्तानगंज बुद्ध (Sultanganj Buddha)

साल 1861 में बिहार के सुल्तानगंज में रेलवे निर्माण के दौरान गुप्त काल की यह अत्यंत दुर्लभ और विशाल बुद्ध प्रतिमा मिली थी। लगभग साढ़े सात फीट ऊंची और एक टन से अधिक वजनी यह ताम्र प्रतिमा धातु शिल्प का एक बेजोड़ नमूना है। खोजे जाने के कुछ समय बाद ही इसे चुपचाप इंग्लैंड भेज दिया गया, और आज यह बर्मिंघम संग्रहालय और कला दीर्घा में रखी हुई है।

3. अमरावती मार्बल्स

वर्तमान में यह ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन मैं है। यह 120 बेहद बारीकी से तराशी गई चूना पत्थर (लाइमस्टोन) की मूर्तियों और शिलालेखों का शानदार संग्रह है। यह संग्रह ईसा पूर्व पहली सदी से लेकर तीसरी सदी के बीच का माना जाता है। ये कलाकृतियां पहले आंध्र प्रदेश स्थित महान अमरावती स्तूप के चारों ओर लगी हुई थीं, जो प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्मारकों में से एक था।

4. टीपू सुल्तान की तलवार और बाघ

मैसूर के शेर कहे जाने वाले टीपू सुल्तान की तलवार और उनका यांत्रिक बाघ अंग्रेजों की लूट का बड़ा हिस्सा थे। यह यांत्रिक बाघ लकड़ी का बना है, जिसमें एक अंग्रेज सैनिक को बाघ द्वारा दबोचे हुए दिखाया गया है; इसे चलाने पर अंग्रेज के रोने और बाघ के गरजने की आवाज आती है। 1799 में श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज इसे अपने साथ ले गए, जो अब विक्टोरिया एंड अल्बर्ट संग्रहालय में है। वहीं उनकी कई तलवारें भी समय-समय पर विदेशों में नीलाम होती रही हैं।

5. महाराजा रणजीत सिंह का सिंहासन

महाराजा रणजीत सिंह का यह भव्य सिंहासन सोने की शुद्ध परतों से मढ़ा हुआ है। इसे प्रसिद्ध सुनार हफीज मुहम्मद मुल्तानी ने 19वीं सदी की शुरुआत में तैयार किया था। साल 1849 में जब अंग्रेजों ने पंजाब पर अधिकार किया, तो उन्होंने राज्य के खजाने के साथ इस अद्वितीय सिंहासन को भी जब्त कर लिया और इसे लंदन के 'विक्टोरिया एंड अल्बर्ट संग्रहालय' में रखवा दिया। यह आठ कोनों वाला और सुनहरी सजावट से सुसज्जित सिंहासन सिख साम्राज्य की शाही भव्यता का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है.इसका डिजाइन कमल (लोटस) की पंखुड़ियों से प्रेरित है, जो इसे खास बनाता है।

6. पदशाहनामा पांडुलिपि

यह मौजूदा समय में रॉयल लाइब्रेरी, विंडसर कैसल, यूनाइटेड किंगडम में रखी है। यह एक बेहद सुंदर और चित्रों से सुसज्जित शाही पांडुलिपि है, जिसे मुगल बादशाह शाहजहां ने 1639 में बनवाया था। यह पांडुलिपि उनके शासन के पहले 10 वर्षों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है। इसमें युद्धों के दृश्य, दरबार के समारोह और शाही शादियों के बेहद बारीक और आकर्षक लघु चित्र शामिल हैं। यह पांडुलिपि 1799 में अवध के नवाब की ओर से किंग जॉर्ज III को भेंट की गई थी।

7. कुलु वास

यह भी ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन में रखा है.यह एक दुर्लभ कांस्य (ब्रॉन्ज) से बना बर्तन है, जो हिमाचल प्रदेश की कुलु घाटी में मिला था। यह वास ईसा पूर्व पहली सदी का माना जाता है। इसकी खासियत यह है कि इस पर एक शाही जुलूस का बेहद बारीक और सुंदर चित्र उकेरा गया है। इस कलाकृति के माध्यम से हमें उस समय के कपड़े,संगीत और रथों के डिजाइन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

8. अकोटा ब्रॉन्ज

यह विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय (जिसमें न्यूयॉर्क का मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट भी शामिल है) में है। गुजरात में खोजे गए अकोटा खजाने में जैन धर्म से जुड़ी खूबसूरत कांस्य मूर्तियां शामिल हैं, जो 5वीं से 11वीं सदी ईस्वी के बीच की मानी जाती हैं, हालांकि इस संग्रह का एक बड़ा हिस्सा भारत में ही मौजूद है, लेकिन कुछ बेहद दुर्लभ और महत्वपूर्ण मूर्तियां  जो पश्चिमी भारत की खास कलात्मक शैली को दर्शाती हैं,20वीं सदी के दौरान विदेशी संग्रहालयों तक पहुंच गईं।

9 इलाहाबाद का जेड कछुआ

इस वक्त यह ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन में है। यह एक हरी जेड (कीमती पत्थर) से बना बेहद खूबसूरत और जीवंत कछुए का मॉडल है, जिसे 17वीं सदी की शुरुआत में एक ही पत्थर से तराशा गया था। यह कलाकृति इलाहाबाद (प्रयागराज) में एक प्राचीन जल संरचना (टैंक) के नीचे से खोजी गई थी। इसे मुगल काल की सबसे बड़ी और उत्कृष्ट जेड नक्काशी में से एक माना जाता है।

10. कोणार्क की सूर्य प्रतिमा

वर्तमान स्थान ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन है। यह प्रतिमा लगभग 1200 ईस्वी के आसपास हरे क्लोराइट पत्थर से तराशी गई एक बेहद बारीक और आकर्षक कलाकृति है। यह सूर्य देवता सूर्य को दर्शाती है और इसका मूल स्थान ओडिशा के प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर में था, जिसे राजा नरसिंहदेव प्रथम ने बनवाया था। इस प्रतिमा में सूर्य देव को शाही और दिव्य स्वरूप में दिखाया गया है, उनके साथ सहायक भी दिखाई देते हैं, और आसपास ग्रहों के छोटे‑छोटे प्रतीक भी उकेरे गए हैं।

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