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सिख विरोधी दंगे: जनकपुरी मामले में सज्जन कुमार बरी

दिल्ली की एक अदालत ने पूर्व कांग्रेस नेता एवं पूर्व सांसद सज्जन कुमार को वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान राष्ट्रीय राजधानी के जनकपुरी इलाके में हिंसा भड़काने से संबंधित मामले में बृहस्पतिवार को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
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नई दिल्लीः दिल्ली की एक अदालत ने पूर्व कांग्रेस नेता एवं पूर्व सांसद सज्जन कुमार को वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान राष्ट्रीय राजधानी के जनकपुरी इलाके में हिंसा भड़काने से संबंधित मामले में बृहस्पतिवार को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

विशेष न्यायाधीश दिग्विनय सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि अदालत पीड़ितों और उनके परिवारों द्वारा झेली गई पीड़ा को समझती है लेकिन उसका निर्णय ‘भावनात्मकता से रहित’ होना चाहिए।

न्यायाधीश ने कहा, ‘इस मामले में आरोपी को दोषी ठहराने का फैसला पेश किए गए सबूतों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से, अभियोजन पक्ष ने जिन गवाहों से जिरह की, उनमें से अधिकतर की गवाही सुनी-सुनाई बातों पर आधारित हैं और/या वे ऐसे गवाह हैं जिन्होंने तीन दशकों तक आरोपी का नाम नहीं लिया।’ उन्होंने कहा कि ऐसे गवाहों द्वारा आरोपी की पहचान किए जाने पर भरोसा करना ‘जोखिम भरा होगा और इससे अन्याय हो सकता है।’

न्यायाधीश ने कहा कि इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि कुमार अपराध स्थल पर मौजूद था या उसे वहां किसी ने देखा था। उन्होंने यह भी कहा कि इस घटना के संबंध में किसी दंगाई भीड़ को उकसाने या साजिश रचने का भी कोई सबूत नहीं है। अदालत ने 60 पन्नों के आदेश में कहा, ‘सार और मुख्य बात यह है कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ उचित संदेह से परे ऐसे सबूत पेश करने में विफल रहा है जो किसी आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि के लिए आवश्यक होते हैं।’ अदालत ने उसे विश्वसनीय सबूतों के अभाव में बरी करने का फैसला सुनाया।

आरोपी के अपराध करने का सबूत नहीं

अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि कुमार को इसी तरह के अपराधों में पहले दोषी पाया जा चुका है। उसने कहा कि कोई व्यक्ति भले ही 100 अपराधों में दोषी ठहराया जा चुका हो लेकिन 101वें अपराध में दोषी ठहराने के लिए भी संदेह से परे प्रमाण जरूरी है। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामले में दोषसिद्धि केवल तभी हो सकती है, जब इस बात को लेकर कोई संदेह न रहे कि आरोपी ने अपराध किया है।

एक विशेष जांच दल ने दंगों के दौरान जनकपुरी और विकासपुरी इलाकों में हुई हिंसा की शिकायतों के आधार पर फरवरी 2015 में कुमार के खिलाफ दो प्राथमिकी दर्ज की थीं। पहली प्राथमिकी जनकपुरी में हुई हिंसा के मामले में दर्ज की गई थी, जहां एक नवंबर, 1984 को सोहन सिंह और अवतार सिंह की हत्या कर दी गई थी। दूसरी प्राथमिकी विकासपुरी में दो नवंबर, 1984 को गुरचरण सिंह को कथित रूप से जला दिए जाने के मामले में दर्ज की गई थी। फिलहाल जेल में बंद कुमार को पिछले साल फरवरी में एक अधीनस्थ अदालत ने सरस्वती विहार इलाके में एक नवंबर 1984 को जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

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