

सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : केंद्र और राज्य के बीच शिक्षा योजनाओं को लेकर तनातनी एक बार फिर सामने आई है। केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने मंगलवार को स्पष्ट कहा कि राज्य संचालित विद्यालयों को ‘प्रधानमंत्री स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया (पीएम-श्री)’ योजना का नाम स्वीकार करना ही होगा, तभी उन्हें केंद्र से वित्तीय सहायता मिल सकेगी। उनके इस बयान पर राज्य के शिक्षा मंत्री ब्रात्य बसु ने कड़ा प्रतिवाद किया और योजना के नाम में ‘पीएम’ उपसर्ग को लेकर सवाल उठाए।
आईआईटी कार्यक्रम में दिया बयान
न्यू टाउन स्थित एक आईआईटी कार्यक्रम में बोलते हुए मजूमदार ने कहा कि पीएम-श्री ढांचा अनिवार्य है। उन्होंने कहा, “पीएम-श्री को स्वीकार करना ही होगा। तभी धनराशि दी जाएगी। यह पूरा पैकेज है। आप सिर ले सकते हैं और हाथ छोड़ सकते हैं ऐसा नहीं चलेगा।” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि केरल ने प्रारंभिक आपत्तियों के बावजूद अंततः योजना को लिखित रूप में स्वीकार कर लिया था। उनके अनुसार, ‘पीएम’ शब्द किसी व्यक्ति विशेष का संकेत नहीं है, इसलिए नाम पर आपत्ति का कोई औचित्य नहीं बनता।
1,000 करोड़ रुपये से अधिक बकाया
सूत्रों के अनुसार, केंद्र पर समग्र शिक्षा अभियान के तहत पश्चिम बंगाल का 1,000 करोड़ रुपये से अधिक बकाया है। राज्य सरकार का कहना है कि वह योजना के वर्तमान स्वरूप में ‘पीएम’ उपसर्ग को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। ब्रात्य बसु ने केंद्र के रुख को “सैद्धांतिक असहमति” करार दिया। उन्होंने कहा कि “केंद्र अनुदान का एक हिस्सा देता है, शेष राज्य सरकार वहन करती है। राजस्व पूरे देश से एकत्र होता है, तो योजनाओं का नाम केवल प्रधानमंत्री के नाम पर क्यों रखा जाए? राज्य का नाम क्यों नहीं जोड़ा जाता?” बसु ने आरोप लगाया कि इस प्रकार की शर्तें संविधान प्रदत्त संघीय ढांचे को कमजोर करती हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र को इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर देना चाहिए। इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य के बीच टकराव ने शिक्षा क्षेत्र में वित्तीय प्रवाह और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।