परंपरा की अनोखी मिसाल : कंधों पर सवार होकर आई मां दुर्गा

* दशकों पुराना रिवाज आज भी कायम
परंपरा की अनोखी मिसाल : कंधों पर सवार होकर आई मां दुर्गा
Published on

अजय साह

अलीपुरदुआर : त्योहारों के मौसम में जब चारों ओर भव्य रोशनी, सजावट और आधुनिकता का रंग दिखता है, वहीं अलीपुरदुआर जिले के फालाकाटा प्रखंड के जटेश्वर नवनगर में सिकदर परिवार आज भी अपनी पुरानी परंपरा को जिंदा रखे हुए है। यहां दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और संस्कारों की अमिट कड़ी है। शनिवार को परंपरा के अनुसार सिकदर परिवार की दुर्गा प्रतिमा को कुमोरतुली से कंधों पर लाया गया। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। परिवार के ठाकुर दलान में आयोजित होने वाली यह पूजा इलाके में अलग ही पहचान रखती है। परिवार के सदस्य रंजीत सिकदर ने कहा कि “हमारे घर की प्रतिमा लगभग पांच किलोमीटर दूर से कंधों पर लाई जाती है और दशमी के दिन इसी तरह कंधे पर सवार कर विसर्जन भी किया जाता है। यही हमारी सबसे बड़ी परंपरा और गर्व की बात है।” पूजा के इन दिनों में सिकदर परिवार का घर केवल उनका निजी आंगन नहीं रहता, बल्कि पूरे मोहल्ले और आसपास के गांवों के लोगों के लिए एक संगम स्थल बन जाता है। भले ही यहां भव्य पंडालों जैसी रोशनी और आधुनिक साज-सज्जा न होती हो, लेकिन श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक वातावरण इसे और भी खास बना देते हैं। इलाके के लोग मानते हैं कि यही सादगी और पारिवारिक मेलजोल इस पूजा को अनूठा बनाता है। पता चला कि सिकदर परिवार की पूजा क्षेत्र में जितनी प्रसिद्ध है इसका इतिहास भी उतना ही रोचक है।

कब और कैसे शुरू हुई थी यह परंपरा :

परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के अनुसार, यह परंपरा सबसे पहले बांग्लादेश में शुरू हुई थी। वहां से परिवार के सदस्य जब भारत आए, तो इस पूजा को भी अपने साथ लाए और आज तक उसी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। शुरुआत में इस पूजा में भैंसों की बलि दी जाती थी, लेकिन समय के साथ यह परंपरा बंद कर दी गई। अब पूजा पूरी तरह से भक्तिभाव, भोग और मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न होती है। पूजा का सबसे खास पहलू अष्टमी की रात होने वाली रक्षा काली पूजा है। यह परंपरा आज भी पूरी निष्ठा से निभाई जाती है। परिवार के सदस्य मानते हैं कि इससे घर-परिवार और पूरे गांव पर देवी मां की विशेष कृपा बनी रहती है।

पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बना देता : सिकदर परिवार की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है। यह इलाके के लोगों को जोड़ने का माध्यम भी है। पूजा के दिनों में पड़ोसी और रिश्तेदार सभी एक परिवार की तरह जुटते हैं। प्रसाद वितरण, पूजा अनुष्ठान और सांस्कृतिक मेलजोल से यह आयोजन पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बना देता है। आज जब समय और आधुनिकता की दौड़ में कई पुरानी परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं, सिकदर परिवार का यह प्रयास प्रेरणादायक है। कंधों पर प्रतिमा लाने और विसर्जन करने की परंपरा न केवल आस्था को जीवित रखती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश भी देती है कि पूजा का असली महत्व दिखावे में नहीं, बल्कि श्रद्धा और परंपरा के पालन में है। अलीपुरदुआर का यह अनोखा आयोजन हर साल भक्तों को यही सिखाता है कि परंपराएं चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हों, यदि उनमें श्रद्धा और विश्वास हो तो वे समय के साथ और भी जीवंत और प्रासंगिक हो जाती हैं।

logo
Sanmarg Hindi daily
sanmarg.in