शरतचंद्र की 88वीं पुण्यतिथि पर विशेष कार्यक्रम आयोजित

शरतचंद्र की 88वीं पुण्यतिथि पर विशेष कार्यक्रम आयोजित
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सन्मार्ग संवाददाता

हुगली: कथा साहित्य के महापुरुष शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की 88वीं पुण्यतिथि उनकी जन्मस्थली पर श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी, साहित्यप्रेमी और छात्र उपस्थित थे, जिन्होंने माल्यार्पण कर शरतचंद्र को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का आयोजन शरतचंद्र स्मृति पाठागार द्वारा किया गया, जिसका उद्देश्य उनके साहित्यिक योगदान को याद रखना और युवा पीढ़ी में साहित्यिक रुचि बढ़ाना था।

पाठागार के कार्यक्रम में क्षेत्र के विभिन्न स्कूलों के मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया। पाठागार की ओर से सर्वश्रेष्ठ पाठक का पुरस्कार आनंदमोहन हरि को दिया गया, जिन्हें दिवंगत अमितकुमार नाहा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार समारोह ने विद्यार्थियों को प्रेरित करने के साथ-साथ उनके साहित्यिक क्षमताओं को भी उजागर किया।

बालागढ़ विजयकृष्ण महाविद्यालय के प्राध्यापक पार्थ चट्टोपाध्याय ने शरत साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शरतचंद्र के साहित्य में सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाएं और सांस्कृतिक मूल्यों का अद्वितीय समावेश है, जो आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। उनका कथाकथन और जीवन मूल्य आज के समय में भी समाज को दिशा देने में सहायक हैं।

कार्यक्रम को और भी भावपूर्ण बनाने के लिए सूचना विभाग द्वारा प्रस्तुत बाउल संगीत ने उपस्थित जनों के मन को आनंदित किया। संगीत ने साहित्यिक कार्यक्रम के वातावरण को और जीवंत बना दिया। जिला परिषद के कर्माध्यक्ष निर्माल्य चक्रवर्ती सहित कई विशिष्टजन भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे और उन्होंने आयोजन की सराहना की।

इस आयोजन ने न केवल शरतचंद्र के साहित्य और उनके योगदान को याद किया, बल्कि युवाओं को उनके जीवन मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक संवेदनाओं से परिचित कराने का अवसर भी प्रदान किया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने इस पहल को सराहा और आशा जताई कि ऐसे कार्यक्रम युवाओं में साहित्य और सांस्कृतिक चेतना बढ़ाने में मदद करेंगे।

अंततः, शरतचंद्र की पुण्यतिथि पर आयोजित यह समारोह साहित्यिक जगत और स्थानीय समाज दोनों के लिए प्रेरणादायक रहा। पाठागार और स्कूलों के सहयोग से यह आयोजन उनके जीवन और रचनाओं को वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रखने का एक सशक्त प्रयास साबित हुआ।

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