महाराष्ट्र के 265 तालुका सूखाग्रस्त घोषित

महाराष्ट्र के करीब 74% हिस्से पर सूखे का असर
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर
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मुंबई : महाराष्ट्र में कम बारिश और लंबे समय तक बने वर्षा-अभाव के कारण राज्य सरकार ने 358 में से 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब राज्य के कई कृषि क्षेत्रों में खरीफ फसलों पर बारिश की कमी का सीधा असर दिखाई दे रहा है। उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों से भी स्पष्ट है कि महाराष्ट्र में सूखे के आकलन के लिए केवल बारिश की मात्रा ही नहीं, बल्कि बारिश का वितरण, फसल की स्थिति, मिट्टी की नमी और अन्य संकेतकों को भी देखा जाता है।

265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित करने का क्या मतलब है?

राज्य में कुल 358 तालुकों में से 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। यानी लगभग 74% तालुका इस घोषणा के दायरे में आ गए हैं। इसका महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि तालुका स्तर पर सूखे की स्थिति का सीधा संबंध कृषि, पशुधन, पेयजल और ग्रामीण रोजगार से होता है। महाराष्ट्र सरकार सूखे के आकलन के लिए वर्षा की मात्रा और उसके वितरण के साथ-साथ फसल की स्थिति, मिट्टी की नमी तथा रिमोट-सेंसिंग आधारित संकेतकों का भी इस्तेमाल करती है। महाराष्ट्र जल संसाधन नियामक प्राधिकरण के एक दस्तावेज में बताया गया है कि राज्य ने सूखा आकलन के लिए Drought Management Manual 2016 और 2020 की पद्धति अपनाई है तथा MahaMADAT जैसे भू-स्थानिक प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता है।

मुख्यमंत्री के दौरे के बाद सरकार का फैसला

सूखे की गंभीर स्थिति के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया था। इसके बाद सरकार की ओर से सूखाग्रस्त तालुकों की घोषणा की गई। इस निर्णय का सबसे बड़ा असर ग्रामीण महाराष्ट्र में देखने को मिल सकता है, जहां बड़ी आबादी कृषि और उससे जुड़े कामों पर निर्भर है। बारिश की कमी केवल खेतों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पशुओं के लिए चारा-पानी और ग्रामीण परिवारों की दैनिक जल जरूरतों को भी प्रभावित करती है।

मराठवाड़ा में सबसे गंभीर स्थिति

मराठवाड़ा लंबे समय से महाराष्ट्र के उन क्षेत्रों में शामिल रहा है जहां वर्षा की अनिश्चितता और पानी की उपलब्धता कृषि के लिए बड़ी चुनौती रही है। इस बार भी धाराशिव और बीड जैसे जिलों में लंबे समय तक पर्याप्त बारिश नहीं होने की स्थिति सामने आई है। जुलाई के बाद बारिश में लंबा अंतराल रहने से खेतों में खड़ी खरीफ फसलों को नमी की कमी का सामना करना पड़ा। इसका प्रभाव विशेष रूप से उन फसलों पर पड़ता है जिनकी वृद्धि के महत्वपूर्ण चरणों में पर्याप्त पानी आवश्यक होता है। मराठवाड़ा के धाराशिव सहित छह जिले छत्रपति संभाजीनगर संभाग में आते हैं। ऐसे में संभागीय स्तर पर दर्ज वर्षा की कमी पूरे क्षेत्र की कृषि परिस्थितियों का महत्वपूर्ण संकेत देती है।

छत्रपति संभाजीनगर संभाग में 30.8% कम बारिश

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1 जून से 18 सितंबर के बीच छत्रपति संभाजीनगर संभाग में लगभग 424.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। इसके मुकाबले इस अवधि में सामान्य बारिश 613.1 मिलीमीटर होनी चाहिए थी।

इस तरह संभाग में बारिश

वास्तविक: 424.5 मिमी

सामान्य: 613.1 मिमी

कमी: 188.6 मिमी

प्रतिशत कमी: 30.8%

यानी सामान्य बारिश की तुलना में लगभग एक-तिहाई वर्षा कम रही।

महाराष्ट्र सरकार के उपलब्ध वर्षा आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि राज्य में वर्षा का वितरण क्षेत्र के अनुसार काफी अलग रहा है। राज्य के आधिकारिक वर्षा निगरानी पोर्टल पर क्षेत्र, संभाग, जिला और तालुका स्तर तक वर्षा संबंधी रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाती हैं।

पुणे और नासिक संभाग भी प्रभावित

बारिश की कमी केवल मराठवाड़ा तक सीमित नहीं रही। पुणे और नासिक संभागों में भी लगभग 30% बारिश की कमी दर्ज की गई। इन क्षेत्रों में कृषि का बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर निर्भर करता है, इसलिए वर्षा के वितरण में लंबा अंतराल फसलों की उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है। बारिश की कुल मात्रा सामान्य के आसपास पहुंच जाए, तब भी यदि बारिश कुछ ही दिनों में केंद्रित हो और उसके बाद लंबा सूखा अंतराल हो, तो खेती को नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि सूखे का आकलन केवल पूरे मौसम की कुल बारिश से नहीं किया जाता।

अमरावती और नागपुर संभाग में 27% की कमी

विदर्भ के महत्वपूर्ण हिस्सों में भी वर्षा की स्थिति सामान्य से नीचे रही। अमरावती और नागपुर संभागों में करीब 27% कम बारिश दर्ज की गई। विदर्भ में कपास और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों का बड़ा क्षेत्र है। इसलिए बारिश में कमी का प्रभाव सीधे कृषि उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ सकता है। राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण में भी तालुका स्तर पर वर्षा के असमान वितरण को दर्ज किया गया है। उदाहरण के लिए 2023 के मानसून में राज्य के कई तालुकों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज हुई थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र में वर्षा की समस्या अक्सर क्षेत्रीय और तालुका-विशिष्ट होती है।

कोंकण में स्थिति अपेक्षाकृत अलग

कोंकण संभाग में बारिश की कमी करीब 6.3% रही। यह आंकड़ा राज्य के अन्य प्रमुख संभागों की तुलना में कम वर्षा-अभाव को दर्शाता है। महाराष्ट्र की भौगोलिक और जलवायु विविधता के कारण एक ही मानसून के दौरान कोंकण, मराठवाड़ा, विदर्भ और पश्चिमी महाराष्ट्र में वर्षा की स्थिति काफी अलग हो सकती है। इसलिए पूरे महाराष्ट्र की औसत वर्षा का आंकड़ा किसी एक जिले या तालुका की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता।

पूरे महाराष्ट्र में 18.8% बारिश कम

राज्य स्तर पर 1 जून से 18 सितंबर के बीच

वास्तविक वर्षा: 755.9 मिमी

सामान्य वर्षा: 932.3 मिमी

कमी : 176.4 मिमी

कुल कमी: 18.8%

इसका अर्थ है कि राज्य को सामान्य वर्षा के मुकाबले लगभग 176 मिलीमीटर कम पानी मिला।

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