

प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : 22 श्रावण। एक ऐसा दिन, जब बंगाल की स्मृतियों में उदासी उतर आती है। 7 अगस्त 1941 को इसी दिन रवींद्रनाथ ठाकुर ने अंतिम सांस ली थी। कवि चले गए, लेकिन उनके जाने का दृश्य आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है और उसी के साथ जुड़ा है एक ऐसा विवाद, जिसका सच और अफवाह आज तक पूरी तरह अलग नहीं हो पाए हैं।
अंतिम इच्छा रह गई अधूरी
रवींद्रनाथ की इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उन्हें शांतिनिकेतन ले जाया जाए। छातिम के पेड़ के नीचे, बिना आडंबर और बिना भीड़ के उनका अंतिम संस्कार हो लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। निधन की खबर फैलते ही जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी के बाहर जनसैलाब उमड़ पड़ा। देखते ही देखते भीड़ ने पार्थिव शरीर को अपने कब्जे में ले लिया और अंतिम यात्रा शुरू हो गई।
वह शर्मनाक और विवादित क्षण...
उस यात्रा के साथ एक बेहद शर्मनाक कहानी भी जुड़ी है। कहा गया कि कुछ लोगों ने ‘गुरुदेव’ के शरीर से बाल, दाढ़ी और यहां तक कि नाखून भी स्मृति-चिह्न के नाम पर नोच लिए। तपन रायचौधरी, विजया राय और अन्य वरिष्ठ लेखकों के अनुसार यह कहानी लंबे समय तक प्रचलित रही। यहां तक कि कवि की चिता से अस्थियां और राख लेने के लिए भीड़ के बीच होड़ मचने की बातें भी सामने आईं। वर्षों तक संस्मरणों और लेखों में इस घटना का उल्लेख होता रहा।
लेकिन क्या यह सच था?
प्रसिद्ध लेखक नित्यप्रिय घोष ने इस सवाल को गंभीरता से खंगाला। उनकी पड़ताल में सामने आया कि तत्कालीन पुलिस ने एक युवक को गिरफ्तार किया था, जो रवींद्रनाथ के बाल-दाढ़ी बताकर उन्हें बेच रहा था। मगर कवि के पार्थिव शरीर से वास्तव में बाल या दाढ़ी नोचे जाने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। और एक दिलचस्प तथ्य भी सामने आया। जिस एलेक्स आरनसन के लेख के आधार पर चिता से अस्थियां और राख लेने की कहानी कही गई, वे उस दिन कोलकाता में थे ही नहीं।
तो फिर यह कहानी आई कहां से?
शायद यही इतिहास की सबसे कठिन पहेली है। कुछ घटनाएं प्रमाणों से नहीं, स्मृतियों में जीवित रहती हैं। 22 श्रावण की अंतिम यात्रा में अव्यवस्था और बेकाबू भीड़ का सच निर्विवाद है। लेकिन बाल-दाढ़ी नोचे जाने की कहानी संभवतः उसी सामूहिक स्मृति में जगह बना चुकी एक अफवाह है, जिसे वर्षों तक दोहराया जाता रहा। गुरुदेव की अंतिम यात्रा इसलिए केवल शोक की कथा नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाला प्रसंग भी है कि इतिहास और किंवदंती के बीच की दूरी कभी-कभी बहुत छोटी होती है।