

निधि, सन्मार्ग संवाददाता
बेलघरिया: बेलघरिया के रवींद्र कानन इलाके के निवासी अधीर दे आज 100 वर्ष के हो चुके हैं। उनका जन्म अविभाजित भारत के मैमनसिंह (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ था। बंटवारे के बाद, साल 1949 में वे अपने परिवार के साथ भारत चले आए और यहाँ के नागरिक बने। तब से लेकर आज तक, देश में पंचायत चुनाव हो या लोकसभा, अधीर ने कभी भी मतदान केंद्र जाने से परहेज नहीं किया। उनके लिए वोट देना केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय कर्तव्य रहा है।
समस्या हाल ही में तब शुरू हुई जब निर्वाचन आयोग की ओर से उनके नाम एक नोटिस आया। इस नोटिस के अनुसार, उनका नाम SIR (Special Investigation/Summary Inquiry) की सुनवाई की सूची में डाला गया है। उन्हें आगामी 14 तारीख को बेलघरिया के देशप्रिय विद्यानिकेतन में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
अधीर बाबू के परिजनों और पड़ोसियों का मानना है कि चूंकि उनकी उम्र 100 वर्ष हो चुकी है, इसलिए चुनाव आयोग शायद यह भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करना चाहता है कि वे अब भी जीवित हैं या नहीं। लेकिन समस्या यह है कि उम्र के इस मोड़ पर अधीर दे शारीरिक रूप से अत्यंत कमजोर हो चुके हैं। वे ठीक से चल-फिर भी नहीं सकते और बिस्तर से उठना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती है।
अधीर बाबू आजकल दिन-भर उसी सरकारी कागज (नोटिस) को हाथ में लेकर बैठे रहते हैं। उनकी आंखों में आंसू और चेहरे पर डर साफ देखा जा सकता है। उन्होंने रुआंसे स्वर में कहा, "मैंने आजादी के बाद से आज तक एक भी वोट नहीं छोड़ा है। अगर इस आखिरी उम्र में मैं सिर्फ इस कागज की वजह से वोट नहीं दे पाया, तो यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा और दुखद आघात होगा।"
उनके परिवारवालों का कहना है कि वे उन्हें सुनवाई केंद्र तक ले जाने की स्थिति में नहीं हैं। स्थानीय निवासियों और रिश्तेदारों ने निर्वाचन आयोग और जिला प्रशासन से विनम्र अपील की है कि अधीर दे की उम्र और शारीरिक स्थिति को देखते हुए किसी अधिकारी को उनके घर भेजकर सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की जाए।
अधीर दे जैसे 'शताब्दी पुरुष' हमारे लोकतंत्र की जीवित विरासत हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन उनकी इस भावुक अपील पर क्या रुख अपनाता है। क्या चुनाव आयोग के अधिकारी उनके घर पहुँचकर उनकी लोकतांत्रिक आस्था का सम्मान करेंगे, या नियमों की औपचारिकता में एक बुजुर्ग का वोट देने का सपना टूट जाएगा?