

नयी दिल्ली : आपको यह भूल जाना है कि आप अपने या टीम के लिये खेल रहे हैं, बस यही भाव रखना है कि देश के लिये हर हालत में जीतना है तो आपको पदक जीतने से कोई नहीं रोक सकता। भारतीय हॉकी टीम के नाम यह संदेश है 1975 विश्व कप विजेताओं का। भारत ने अब तक एकमात्र विश्व कप 1975 में कुआलालम्पुर में जीता था और उस जीत के सूत्रधार थे असलम शेर खान और अशोक ध्यानचंद। 1975 विश्व कप के फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ 51वें मिनट में विजयी गोल करके भारत को 2-1 से जीत दिलाने वाले अशोक कुमार ने कहा, ‘मैं भारतीय टीम से इतना ही कहूंगा कि यह ध्यान में रखें कि जीत या हार आपकी नहीं, आपके देश की होगी। इससे आपको खुद ब खुद प्रेरणा मिलेगी। यह 51 साल का इंतजार बहुत लंबा हो गया है और अब पदक जीतना ही है।’
वहीं 1975 में सेमीफाइनल में आखिरी मिनटों में स्थानापन्न खिलाड़ी के तौर पर उतरकर मलेशिया के खिलाफ बराबरी का गोल दागने वाले असलम शेर खान ने कहा, ‘हम विश्व कप खेलने उतरे तो हमारे लिये देश मां की तरह था और हम उसी जज्बे से खेलते थे। आपको भी यह सोचकर मैदान पर उतरना होगा कि हम मां के लिये खेल रहे हैं और जुनून ऐसा होना चाहिये कि हर कीमत पर जीतकर उतरेंगे।’ मांट्रियल ओलंपिक 1976 खेल चुके असलम ने कहा, ‘अच्छे प्रदर्शन के साथ देश के सम्मान के लिये खेलने की भावना जरूरी है। आप अगर ये सोचकर खेलें कि अपने लिये या टीम के लिये नहीं बल्कि देश के लिये खेल रहे हैं तो आपको जीतने से कोई नहीं रोक सकता। यह मेरा अपना तर्जुबा है।’
अशोक और असलम 1971 बार्सीलोना विश्व कप में कांस्य और 1973 में एम्सटर्डम में रजत पदक जीत चुके थे लेकिन चैंपियन नहीं बन पाने की कसक ने 1975 में उन्हें जी जान लगाने के लिये प्रेरित किया। उनका कहना है कि कुआलालम्पुर जाने से पहले चंडीगढ में अभ्यास के दौरान पूरी टीम बस स्वर्ण जीतने का ही लक्ष्य लेकर पसीना बहा रही थी। म्युनिख ओलंपिक 1972 में कांस्य पदक जीत चुके अशोक ने कहा, ‘1971 में हमने कांस्य जीता था लेकिन जब सेमीफाइनल हार गए थे तब कोच बलबीर सिंह सीनियर इतना रोये थे कि चुप कराना मुश्किल हो गया था। देश के लिये जीतने का जज्बा ऐसा था। फिर 1973 में रजत मिला तो मन में कसक रह गई कि स्वर्ण से चूक गए।’
महान ध्यानचंद के बेटे और रूप सिंह के भतीजे अशोक ने कहा, ‘मुझे तो यह भी लगता था कि पिताजी और चाचा को ये पदक कैसे दिखाऊं। देश में कांस्य या रजत लेकर लौटने पर शर्म आती थी। असलम ने पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया, ‘हम जब कुआलालम्पुर जा रहे थे तो चंडीगढ में शिविर लगा था जिसमें देश के हर कोने से आये खिलाड़ी मिलकर एक ही लक्ष्य के लिये खेल रहे थे क्योंकि पिछले दो विश्व कप में हम स्वर्ण से चूक गए थे।’ उन्होंने कहा, ‘हमने कभी खुद को किसी से कमतर नहीं माना चाहे जर्मनी हो, हालैंड या आॅस्ट्रेलिया। इसी आत्मविश्वास की जरूरत है और यह जज्बा होने पर इस टीम को कोई नहीं रोक सकता।’
पूरे टूर्नामेंट में सिर्फ सेमीफाइनल में आखिरी मिनटों में उतरे असलम ने कहा, ‘ज्यादा समय मैं बाहर बैठा और व्यक्तिगत तड़प इतनी थी कि रोज रात को सोने से पहले आंख में आंसू आते थे कि मुझे खेलने का मौका नहीं मिला। सेमीफाइनल में आखिरी 15 मिनट में दो हफ्ते की वह तड़प ही मुझसे गोल करा गई।’ यह पूछने पर कि हरमनप्रीत सिंह की कप्तानी वाली टीम को क्या संदेश देना चाहेंगे, असलम ने कहा, ‘यह टीम सक्षम है क्योंकि इसने लगातार दो ओलंपिक में कांस्य पदक जीते हैं। लेकिन ओलंपिक के डायनेमिक्स विश्व कप से अलग होते हैं जिसे ध्यान में रखना होगा।’ उन्होंने यह भी कहा, ‘टोक्यो ओलंपिक कोविड के साये में हुए थे लेकिन पेरिस में उस प्रदर्शन को दोहराना अहम था।
अगर पेरिस ओलंपिक वाले उसी जज्बे से खेल सके तो भारत का 51 साल बाद पोडियम पर रहना तय है।’ वहीं अशोक ने खिलाड़ियों को मैदान पर त्वरित फैसले लेने की सलाह दी और कहा कि बेसिक्स पर डटे रहें। उन्होंने कहा, ‘मैने जिस तरह से खेला और जो सीखा, वह इतना ही है कि किस वक्त, क्या करना है और यह फैसले त्वरित लेने हैं। गेंद पर नियंत्रण, आक्रमण, गेंद पकड़ना, पासिंग यह सब फैसले तुरंत लेने हैं। हॉकी टीम का खेल है और हर खिलाड़ी अहम है। मेरा यह भी मानना है कि फॉरवर्ड पंक्ति को असाधारण प्रयास करने होंगे।’ विश्व कप 15 से 30 अगस्त तक नीदरलैंड और बेल्जियम में खेला जायेगा।