

नयी दिल्ली : एशियाई खेलों में भारतीय हॉकी टीम को पहला स्वर्ण पदक जीते छह दशक बीत गए लेकिन टीम के धुरंधर सेंटर फॉरवर्ड हरबिंदर सिंह के जेहन में आज भी उसकी यादें ताजा है और वह गाना आज तक नहीं भूले जो टीम बस में हमेशा बजता था। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने बैंकॉक में 1966 एशियाई खेलों में पहली बार स्वर्ण पदक जीता था। इसके 32 साल बाद 1998 में बैंकॉक में ही धनराज पिल्लै की कप्तानी में भारत ने दूसरी बार स्वर्ण जीता। इंचियोन में 2014 के बाद हांगझोउ एशियाई खेलों में 2022 में भारतीय टीम ने स्वर्ण जीतकर ओलंपिक के लिये क्वालीफाई किया। टोक्यो ओलंपिक 1964 चैंपियन भारतीय टीम के लिये पांच गोल करने वाले हरबिंदर ने भाषा को दिये इंटरव्यू में कहा, ‘हमने दो साल पहले ही टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण जीता था और लिहाजा जोश काफी हाई था क्योंकि टोक्यो ओलंपिक के ही अधिकांश खिलाड़ी इस टीम में थे।
हमने ठान लिया था कि एशियाई खेलों में भी पहला स्वर्ण जीतकर मानेंगे ।’ तीन बार के ओलंपिक पदक विजेता 83 बरस के इस दिग्गज ने कहा, ‘शंकर लक्ष्मण की कप्तानी वाली हमारी टीम फाइनल में पहुंची थी और मुकाबला दो बार की चैंपियन पाकिस्तान से था। मैच की शुरूआत रफ हुई थी और पहले पांच मिनट में ही पाकिस्तानी खिलाड़ी की स्टिक लगने से हमारे राइट विंग रेलवे के बलबीर सिंह चोटिल हो गए और उन्हें स्ट्रेचर पर बाहर जाना पड़ा।’ उन्होंने कहा, ‘उस समय सब्स्टीट्यूशन का नियम नहीं था और लगभग पूरा मैच हमें दस खिलाड़ियों के साथ खेलना पड़ा। पाकिस्तान की टीम काफी मजबूत थी और पूरे 70 मिनट गोलरहित रहा। अतिरिक्त समय में साढे सात मिनट के पहले हाफ में गोल नहीं हुआ।’ पद्मश्री से नवाजे जा चुके हरबिंदर ने कहा, ‘दूसरा हाफ खत्म होने में पांच मिनट बचे थे और चोटिल बलबीर घुटने में पट्टी बांधकर साइडलाइन में खड़े थे।
बाकी खिलाड़ी उनसे कहने लगे कि एक पैर से खेल ले, बाहर क्यों खड़ा है। अंपायर से पूछकर वह मैदान में आये और किस्मत देखिये कि मैच में एकमात्र गोल हुआ जो उसने ही किया।’ उस समय टीम में रेलवे के बलबीर के अलावा दो और बलबीर सिंह पंजाब और सेना से थे। पुरानी यादें ताजा करते हुए इस वयोवृद्ध खिलाड़ी ने कहा, ‘जब भी हम मैच खेलने जाते थे तो शंकर लक्ष्मण टीम बस में ‘वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो’ बजवाते थे और सभी खिलाड़ी साथ में गाते थे। इससे अपने आप जोश आ जाता था। आज भी मैं यह गाना सुनता हूं तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।’ उन्होंने बताया कि हॉकी अमेच्योर खेल होने के कारण स्वर्ण पदक जीतने पर कोई ईनाम ले नहीं सकते थे लेकिन दिल्ली, अमृतसर और जालंधर में विजय जुलूस निकला। उन्होंने कहा, ‘उस समय हॉकी का ही जलवा था, क्रिकेट उतना नहीं था।’
उन्होंने बताया कि पहले आज की तरह टीम के स्थायी शिविर नहीं लगते थे बल्कि टूर्नामेंट से पहले ही शिविर लगाया जाता था और काफी कठिन परिस्थितियां रहती थी। जूनियर और सीनियर एथलेटिक्स सौ और 200 मीटर दौड़ में भी स्वर्ण पदक जीत चुके रफ्तार के जादूगर रहे हरबिंदर ने कहा, ‘उस समय जालंधर में शिविर लगता था। फेडरेशन शिविर का खर्च उठाती थी, उस समय सरकार से पैसा नहीं मिलता था। जून, जुलाई, अगस्त की गर्मी में शिविर होता था, एसी कूलर नहीं होते थे और मच्छरों की भरमार थी। काफी कठिन रहता था लेकिन डाइट शानदार होती थी, एकदम देसी पंजाबी खाना।’ उनका मानना है कि हॉकी में आये बदलावों ने खेल की कलात्मकता खत्म कर दी है जबकि एक समय पर दर्शक खेल देखने के लिये सीट पर खड़े हो जाते थे। उन्होंने कहा, ‘उस समय आफसाइड , स्टिक, आब्स्ट्रक्शन के नियम थे तो काफी संभलकर खेलना पड़ता था।
अंपायरों पर गेम काफी निर्भर करता था क्योंकि तकनीक नहीं थी। आज की हॉकी देखने में वह मजा नहीं है क्योंकि वह कलात्मकता नहीं रह गई और कई बार तीन टच में गोल हो जाते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘पहले पास, रिटर्न पास, ड्रिबलिंग देखने दर्शक सीट पर खड़े हो जाते थे। कई बार मैने खुद पाकिस्तान, इंग्लैंड, हालैंड, जर्मनी जैसी दिग्गज टीमों के खिलाफ सेंटर लाइन से गेंद लेकर पूरी डिफेंस को चकमा देकर गोल किये हैं।’ हैदराबाद में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खाली पड़े स्टेडियमों को देखकर दुखी हरबिंदर ने कहा कि हॉकी के मैदान पर दर्शको को लौटाने के लिये अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को घरेलू हॉकी खेलनी चाहिये। उन्होंने कहा, ‘हम सभी अपने विभाग से हॉकी खेलते थे चाहे गोल्ड कप हो, बेटन कप या ओबेदुल्लाह कप।
भारतीय खिलाड़ियों को देखने खूब दर्शक आते थे लेकिन आजकल अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी घरेलू हॉकी खेलते ही नहीं है अगर स्टार खिलाड़ी नहीं खेलेंगे तो खेल की लोकप्रियता कैसे बढेगी।’ हरमनप्रीत सिंह की कप्तानी वाली भारतीय टीम को जापान में होने वाले एशियाई खेलों में स्वर्ण का प्रबल दावेदार बताते हुए उन्होंने कहा, ‘एशियाई खेलों में भी अब प्रतिस्पर्धा नहीं रह गई है। भारतीय टीम को फिर स्वर्ण पदक जीतना ही चाहिये क्योंकि जापान, मलेशिया, पाकिस्तान की हॉकी का वह स्तर नहीं रह गया है ।’ उन्होंने हालांकि कहा, ‘लेकिन जापान एक बार अप्रत्याशित रूप से स्वर्ण जीत चुका है (2018, जकार्ता) और भारत को किसी टीम को हलके में नहीं लेना चाहिये। विश्व कप की नाकामी को भुलाकर नयी शुरूआत करनी होगी।’