'आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया' चांदमुनि मेला में दुकान लगाना हुआ महंगा

चांदमुनि मंदिर के प्रति उनका विश्वास
चांदमुनि मंदिर के प्रति उनका विश्वास
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सिलीगुड़ी: युग बदला पीढ़ियां बदली लेकिन नहीं बदली भक्तों की अटूट भक्ति और चांदमुनि मंदिर के प्रति उनका विश्वास | माना जाता है भगवान शिव यहां भक्तों की मनोकामना को पूर्ण करते है | इस आधुनिक युग में भी भगवान शिव की महिमा का गुणगान करते हुए भक्त यहां पहुंच ही जाते हैं | शिवरात्रि के दिन तो लाखों की संख्या में यहां भक्त भगवान को जलाभिषेक करते है | मंदिर परिसर में लगने वाला मेला भी काफी विख्यात है | पहले जब यह एक चाय बागान इलाका था तब मेला बड़े पैमाने में लगता था, लेकिन अब यह मेला सीमित होता जा रहा है | चांदमुनि मेले में लोग पीढ़ी दर पीढ़ी दुकान लगाते आ रहे है | कुछ व्यापारी कूचबिहार, कोलकाता,झारखंड तो कुछ सरहद पर नेपाल से भी यहां आते है | दुकानों ने मेले के बदलते रूप को लेकर कई प्रकार की जानकारियां सांझा की |

11 सालों से मिट्टी के बर्तन और गुल्लक बेचने वाली अनीता पाल ने बताया अब मिट्टी के खिलौने ज्यादातर नहीं बिकते गुल्लक भी गिने चुने लोग ही खरीदते हैं समय के साथ मेले में भीड़ की कमी आई है, बच्चों को भी अब ये मिट्टी के खिलौने नहीं भाते: अनीता पाल, सिलीगुड़ी

ढोलक को खरीदने वाले लोगों में काफी कमी आ गई है, चोपड़ा कूचबिरह और अलग अलग मेलों में ऐसा नहीं है वहां अब भी व्यापार अच्छा होता है | 15 सालों में मेला काफी बदला गया है अब वह रौनक नहीं रही बिक्री में कमी आयी है: मोहम्मद अलाउद्दीन, कोलकाता

तिलहरी, पोते,कानों की बालियां और विभिन्न श्रृंगार के सामान बेचने वाले राम बहादुर रावत ने बताया मेले में अब ऐसे सामान नहीं बिकते कुछ ग्रामीण महिलाएं ही ज्यादातर खरीदारी करती है इतने दूर से आते है लेकिन कमाई ना के बराबर है: राम बहादुर रावत, नेपाल

विभिन्न तरह के कड़े, शंकर, माला, अंगूठियां बेचने वाले अमृतसर के अवतार सिंह ने कहा लोगों की भीड़ के साथ बिक्री दोनों ही कम हुए है 13 साल बीत गए लेकिन इस बार की तरह पहले नहीं हुआ, आधुनिकता का असर देखने को मिलता है: अवतार सिंह, अमृतसर

नमकीन और मीठे के स्वाद अब लोगों को नहीं भाते, पहले जहां लोग किलो के हिसाब से यह सारे खाने की सामग्रियां खरीदते थे अब इनका वजन कम हो गया है | समय के साथ लोगों की पसंद और स्वाद में असर दिखता है और भीड़ भी कम है : सुख हालदार, सिलीगुड़ी

रंग बिरंगी चूड़ियों की खनक से मेले का एक कोना गुलजार रहता था, महिलाएं, युवतियां और बच्चियां खींचे चले आते थे, पहले जहां 250 में दुकान लगाया जाता था अब 6000 हजार देना पड़ता है, आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया के बराबर हो गया है : मोहम्मद अकरम, सिलीगुड़ी

खिलौनों को देख बच्चे आकर्षित होते हैं और यह अब भी जारी है | लेकिन पहले की तुलना में कुछ भीड़ कम होने का असर व्यापार पर पड़ा है, लेकिन फिर भी मुनाफा निकल आता है, जो बच्चें इस गली में आ जाते है वे कुछ न कुछ खरीदवा ही लेते है : दामोदर साहू, झारखंड

चश्मे और घड़ी को देखकर लोगों की भीड़ तो इकट्ठा हो जाती है लेकिन खरीदारी करने वालों में कमी आई है | पहले की तरह मेले में वह भव्यता नहीं रही, अब लोगों की पसंद ब्रांडेड चश्मे और घड़ियां बन चुकी है जिसका प्रभाव पड़ा है व्यापार पर: बिपिन जैसवाल , सिलीगुड़ी

मंदिर परिसर में लगभग 12 सालों से पूजन सामग्री बेच रही हूं एक फिट के हिसाब से रूपया लिया जाता है, मेरी दुकान 4 फीट की है यानी कि मुझे 4000 हजार देना पड़ेगा, जो की काफी महंगा है अब पहले की तरह मुनाफा नहीं होता है: मुक्ति दास, माटीगाड़ा

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