

गंगटोक : सिक्किम हाईकोर्ट ने भारतीय सेना के लिए अधिग्रहित भूमि के संबंध में मंगन कलेक्टर द्वारा जारी 564.96 करोड़ रुपये के मुआवजा अवॉर्ड को अंतिम मुआवजा निर्धारण नहीं मानते हुए राज्य सरकार को सभी संबंधित पक्षों की आपत्तियां सुनकर भूमि के मूल्यांकन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश ए. मुहम्मद मुस्ताक की पीठ भारत सरकार और रक्षा संपदा अधिकारियों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में 18 जनवरी, 2023 को जारी उस अवॉर्ड को चुनौती दी गई थी, जो अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट लाचेन, लाचुंग और चुंगथांग में 102.11 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण से संबंधित है।
मामले के अनुसार, कलेक्टर ने भूमि की दर 150 रुपये प्रति वर्ग फुट निर्धारित की थी, जबकि प्रारंभिक अधिसूचना के समय यह दर 65 रुपये प्रति वर्ग फुट थी। रक्षा अधिकारियों ने मूल्यांकन पर कई बार आपत्ति जताई थी, लेकिन उनके विरोध पर अवॉर्ड में विचार नहीं किया गया।
विवाद का मुख्य मुद्दा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन था।
अधिनियम की धारा 23 के तहत कलेक्टर द्वारा मुआवजे का प्रारंभिक निर्धारण किया जाता है, जिसमें प्रारंभिक अधिसूचना की तारीख पर भूमि का बाजार मूल्य शामिल होता है। वहीं, धारा 26 में बाजार मूल्य निर्धारित करने की प्रक्रिया दी गई है। इसके बाद अधिनियम के अन्य प्रावधानों के तहत अंतिम अवॉर्ड और लागू अतिरिक्त मुआवजे सहित भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
हाईकोर्ट ने पाया कि कलेक्टर ने प्रारंभिक मूल्यांकन और अंतिम अवॉर्ड को एक ही संयुक्त आदेश में शामिल कर दिया था। अदालत के अनुसार, यह प्रक्रिया उचित नहीं थी, क्योंकि इससे अंतिम अवॉर्ड जारी होने से पहले राज्य सरकार को धारा 36 के तहत मूल्यांकन की वैधता और औचित्य की जांच करने के अवसर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सामान्यतः सरकार अपने ही कलेक्टर द्वारा जारी अवॉर्ड को पारंपरिक रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दे सकती। हालांकि, इस मामले में संयुक्त आदेश के कारण वैधानिक प्रक्रिया प्रभावित हुई थी, इसलिए अदालत ने घोषणात्मक राहत की मांग को स्वीकार्य माना।
हाईकोर्ट के इस निर्देश से भूमि अधिग्रहण मुआवजे के मूल्यांकन की प्रक्रिया पर पुनर्विचार का रास्ता खुल गया है। राज्य सरकार को अब सभी संबंधित पक्षों की आपत्तियों पर विचार करते हुए कानून के अनुरूप आगे की कार्रवाई करनी होगी।